पांडातराई नगर पंचायत में गरीबों के नाम पर बन रहे शोरूम और कांपलेक्स ,जिम्मेदार मौन
कबीरधाम जिले के पांडातराई नगर पंचायत में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत बड़े पैमाने पर गड़बड़झाला सामने आ रहा है। इस योजना का उद्देश्य वास्तव में शहरी गरीबों को पक्के आवास उपलब्ध कराना है, लेकिन यहां इसका उपयोग कुछ लोग व्यवसायिक लाभ के लिए कर रहे हैं।
कई लोग गरीबी का हवाला देकर इस योजना का लाभ ले रहे हैं, लेकिन बाद में उसी स्थान पर आवास के नाम पर व्यवसायिक कांप्लेक्स, शोरूम और दुकानों का निर्माण कर लेते हैं। कई प्रकरणों में यह देखा गया है कि मुख्य सड़क, चौक-चौराहों और बाजारों के किनारे इस योजना के मकान नहीं, बल्कि लाखों की दुकानों में तब्दील हो चुके हैं।
क्या कहते हैं नियम
प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत स्पष्ट प्रावधान है कि
1. लाभार्थी शहरी गरीब वर्ग (EWS) या निम्न आय वर्ग (LIG) से होना चाहिए।
2. स्वामित्व का प्रमाण अनिवार्य है – जैसे पट्टा या वैध दस्तावेज।
3. निर्माण का उपयोग केवल आवासीय प्रयोजन के लिए किया जा सकता है।
4. योजना के अंतर्गत निर्मित मकान को बेचना, किराए पर देना या व्यवसायिक उपयोग में लाना प्रतिबंधित है।
5. अपात्र व्यक्ति द्वारा ली गई सब्सिडी वसूली योग्य अपराध की श्रेणी में आता है।
प्रशासनिक चूक या मिलीभगत
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि कई प्रकरणों में नगर पंचायत के अधिकारी समीक्षा या भौतिक सत्यापन किए बिना स्वीकृति प्रदान कर देते हैं। कमीशनखोरी और जनप्रतिनिधियों के दबाव की भी चर्चा आम है।
कुछ मामलों में अधिकारी निर्माण स्थल पर निरीक्षण करने जाते हैं, फिर भी कार्रवाई नहीं होती, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं।
जांच की मांग, संभावित बड़ा खुलासा
जनप्रतिनिधियों और पीड़ित नागरिकों की मांग है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए। यदि दस्तावेज और मौके का सही मिलान किया जाए, तो दर्जनों आवेदनों में फर्जीवाड़ा उजागर हो सकता है।
अगर जांच की गई तो यह साबित हो सकता है कि योजना के लाभार्थियों में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनके पास पहले से पक्के मकान, दुकानों का व्यापार और अच्छा आर्थिक आधार है।
बंद हो गोरखधंधा, सजा मिले दोषियों को
पांडातराई ही नहीं, बल्कि जिले के अन्य शहरी क्षेत्रों में भी इसी तरह के मामलों की सुगबुगाहट है। यदि शासन सचमुच गरीबों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना चाहता है, तो जरूरी है कि
हर स्वीकृत आवास की स्थल निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
निर्माण के बाद उपयोग की जांच हो।
नियमों का उल्लंघन करने वालों से सब्सिडी की वसूली की जाए और एफआईआर दर्ज हो।
पांडातराई का यह प्रकरण प्रधानमंत्री आवास योजना की मंशा के खिलाफ जाकर भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें दिखाता है। यदि यह गोरखधंधा ऐसे ही फलता-फूलता रहा, तो असली जरूरतमंद लोग हमेशा वंचित रह जाएंगे, और सरकारी योजनाएं महज दिखावा बनकर रह जाएंगी।