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“राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र बैगा युवक की संदिग्ध मौत! चार दिन बाद ससुराल में फांसी पर लटका मिला शव, प्रशासनिक लापरवाही पर फूटा जनआक्रोश”

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कवर्धा , 
राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बैगा जनजाति से संबंध रखने वाले युवक विश्राम बैगा पिता सुखीराम (उम्र 30 वर्ष) की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने प्रशासन की संवेदनहीनता और लापरवाही को उजागर कर दिया है। युवक का शव उसकी ससुराल ग्राम छीरपानी (थाना कुकदूर) में फांसी पर लटका हुआ मिला, वो भी तब जब मौत को चार दिन बीत चुके थे।
मृतक विश्राम बैगा ग्राम पंचायत कांदावानी के कानाखेरो पारा का निवासी था, जो हाल ही में अपने साले के घर गया हुआ था। परिजनों और ग्रामीणों के अनुसार घर पर कोई नहीं था और दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। जब साले ने बाहर से आकर ताला खोला, तब घर के भीतर शव फांसी पर झूलता मिला। मामला तब और संदेहास्पद हो गया जब सोमवार सुबह शव बरामद होने के बाद भी पोस्टमार्टम समय पर नहीं हो सका।
थाने से कार में भरकर सड़क पर रखा गया शव!
जानकारी के अनुसार, शव को पंचनामा के बाद कार में भरकर थाने लाया गया, लेकिन रात में शव को थाना परिसर के भीतर रखने के बजाय कार सहित सड़क पर रख दिया गया, जिससे आक्रोशित परिजनों और पंडरिया से आनंद सिंह की टीम ने ग्रामीणों के साथ मिलकर विरोध जताया। भारी दबाव के बाद शव को दोबारा थाना परिसर के भीतर लाया गया।
पोस्टमार्टम में देरी बनी पीड़ा का कारण
सोमवार दोपहर करीब 3 बजे शव को अस्पताल ले जाया गया, पर मेडिकल ऑफिसर ड्यूटी पर मौजूद नहीं थे और स्टाफ की ड्यूटी भी नियमित नहीं थी। नियमों के अनुसार, पुलिस को तुरंत डॉक्टर को सूचना देकर पोस्टमार्टम कराना था, परंतु सूचना देने में लापरवाही बरती गई, जिससे पोस्टमार्टम सोमवार को भी नहीं हो सका और मृतक के परिजनों को एक और रात शव के साथ गुजारनी पड़ी।
जनजातीय अस्मिता पर सवाल
बैगा जनजाति, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा “दत्तक पुत्र” की मान्यता प्राप्त है, उसके युवक के साथ हुई इस तरह की उपेक्षा न केवल पीड़ादायक है, बल्कि यह प्रशासन की आदिवासी संवेदनाओं के प्रति असंवेदनशीलता को भी दर्शाती है। घटना के बाद क्षेत्र में शोक और आक्रोश का माहौल है। गांववाले और परिजन प्रशासनिक अमले की उदासीनता पर नाराजगी जता रहे हैं।
मांग : न्याय और सम्मान की
परिजनों ने इस मौत की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। साथ ही, यह भी मांग उठ रही है कि आदिवासी क्षेत्रों में इस प्रकार की घटनाओं की जांच जनजातीय आयोग और मानवाधिकार आयोग के माध्यम से की जाए, ताकि आदिवासी समाज के प्रति सम्मान और संवेदना बनी रह सके।

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