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पंडरिया के वनांचल में धान खरीदी पर बड़ा सवाल सूखत के नाम पर कटौती या खुली लूट , आदिवासी किसान व्यवस्था के दबाव में

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एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने, आदिवासी क्षेत्रों में पारदर्शी धान खरीदी और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का दावा कर रही हैं, वहीं कवर्धा जिले के पंडरिया ब्लॉक के वनांचल क्षेत्र से सामने आया मामला इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पंडरिया ब्लॉक के आदिवासी बहुल इलाकों में संचालित धान खरीदी केंद्र—कोड़वागोडन, सराईसेत, कामठी, चांटा, कुकदूर सहित अन्य केंद्रों—पर किसानों के साथ खुलेआम मनमानी किए जाने के आरोप सामने आए हैं। किसानों का आरोप है कि केंद्र प्रभारी सूखत (नमी) के नाम पर प्रति क्विंटल एक से ढाई किलोग्राम तक अतिरिक्त धान जबरन लिया जा रहा है।
निर्धारित शुल्क के बावजूद अतिरिक्त वसूली
किसानों का कहना है कि शासन द्वारा धान खरीदी के दौरान हमाली एवं प्रासंगिक शुल्क पहले ही 22.40 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इसके बावजूद केंद्र प्रभारियों द्वारा न केवल अतिरिक्त धान लिया जा रहा है, बल्कि हमाली के नाम पर नकद वसूली भी खुलेआम की जा रही है।
वनांचल क्षेत्र के आदिवासी एवं छोटे किसानों के लिए यह आर्थिक दोहन किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है। सीमित उत्पादन वाले किसान जब अपनी पूरी फसल लेकर केंद्र पहुंचते हैं, तब उनसे कटौती के नाम पर चुपचाप अतिरिक्त धान ले लिया जाता है।
विरोध करने पर धमकी, रिजेक्शन का डर
स्थानीय किसानों का आरोप है कि यदि कोई किसान इस अवैध कटौती का विरोध करता है तो उसे धान खरीदी में देरी, तौल रोकने या सीधे धान रिजेक्ट करने की धमकी दी जाती है। मजबूरी में किसान प्रशासनिक भय और आर्थिक संकट के चलते इन अवैध मांगों को मानने को विवश हैं।
यह स्थिति उस सरकारी मंशा के बिल्कुल विपरीत है, जिसमें आदिवासी किसानों को बिचौलियों और भ्रष्ट व्यवस्था से मुक्त करने का संकल्प लिया गया है।
जांच रिपोर्ट के बावजूद ‘इनाम’ जैसी पदस्थापना!
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खाद्य निरीक्षक की जांच रिपोर्ट में गंभीर आरोप दर्ज होने के बाद जिन विक्रेताओं को चावल घोटाले से जोड़ा गया था, उनमें से कुछ को दोबारा आदिवासी सेवा सहकारी समिति में शाखा प्रबंधक बनाकर पदस्थ किया गया।
यह फैसला आज वनांचल क्षेत्र में चर्चा और आक्रोश का विषय बना हुआ है।
प्रशासन के सामने अग्निपरीक्षा
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या जिला प्रशासन इस गंभीर अनियमितता पर सख्त कार्रवाई करेगा।
या फिर आदिवासी किसान यूँ ही व्यवस्था की मनमानी का शिकार होते रहेंगे ।
सरकार की मंशा साफ है—पारदर्शी धान खरीदी, शोषण मुक्त व्यवस्था और किसान हितों की रक्षा। अब जरूरत है कि जमीनी स्तर पर इन उद्देश्यों को ईमानदारी से लागू किया जाए, ताकि वनांचल का किसान भरोसे के साथ अपनी उपज बेच सके, न कि डर और कटौती के साए में।

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