कबीरधाम के पंचायत विभाग में इन दिनों विकास कम और विकास की कहानियां ज्यादा सुनाई दे रही हैं। कागजों में नालियां चमचमा रही हैं, सड़कें दौड़ रही हैं और डैम पानी से लबालब हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में गुणवत्ता कहीं रास्ता भटक गई है।
कुर्सी के कान बताते हैं कि विभाग का मुखिया इन दिनों चाटुकारों की ऐसी घेराबंदी में है कि असली फीडबैक की आवाज कुर्सी तक पहुंच ही नहीं पा रही। जो जितना गुणगान कर रहा है, वह उतना ही “करीबी” माना जा रहा है।
मनरेगा का स्वरूप भी अब बदल चुका है। पहले गांवों से मांग आती थी, ग्रामसभा निर्णय लेती थी और काम स्वीकृत होते थे। अब चर्चा यह है कि पहले अनुशंसा होती है, फिर मांग तैयार होती है। यानी विकास अब जरूरत से नहीं, व्यवस्था से तय होने लगा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई निर्माण कार्य पूरे होने के बाद अधिकारी निरीक्षण के लिए पहुंच रहे हैं। मानो निर्माण की गुणवत्ता देखने नहीं, बल्कि फीता काटने के बाद फोटो खिंचवाने की औपचारिकता निभाने पहुंचे हों।
कुर्सी के कान यह भी फुसफुसा रहे हैं कि गड़बड़ियों को रोकने के नाम पर “एक फीसदी चढ़ावे” का नया गणित भी विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है। जनता पूछ रही है कि यदि गुणवत्ता की निगरानी इतनी मजबूत है, तो फिर हर निर्माण के कुछ ही दिनों में दरारें क्यों दिखाई देने लगती हैं।
जिले में विकास तो खूब हो रहा है, बस उसकी गुणवत्ता आज भी तलाश में है।