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बीईओ संजय दुबे पर गंभीर आरोपों की जांच शुरू: मानसिक प्रताड़ना और दखलंदाजी के मामले में 5 दिन में मांगी रिपोर्ट

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जिला शिक्षा अधिकारी, कबीरधाम द्वारा जारी आदेश ने शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया है। विकास खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) संजय दुबे के खिलाफ सहायक विकास खंड शिक्षा अधिकारी (एबीईओ) सुश्री ममता गुप्ता की शिकायत पर औपचारिक जांच के आदेश दे दिए गए हैं। आरोपों में मानसिक प्रताड़ना, विभागीय कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप और पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर बिंदु शामिल हैं।

कार्यालय से जारी आदेश क्रमांक 12384/शिकायत/F-K-131/2026-27 दिनांक 01.04.2026 के अनुसार, शिकायत को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हुए दो सदस्यीय जांच दल गठित किया गया है। जांच दल को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे पूरे प्रकरण की तथ्यात्मक और समग्र जांच कर 5 दिवस के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। आदेश में यह भी कहा गया है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से की जाए।

शिकायतकर्ता एबीईओ ने आरोप लगाया है कि बीईओ संजय दुबे द्वारा लगातार मानसिक दबाव बनाया जा रहा है और नियमित प्रशासनिक कार्यों में बाधा डाली जा रही है। इससे कार्यालयीन वातावरण प्रभावित हो रहा है और विभागीय कार्यों की गति पर भी असर पड़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह विवाद पिछले कुछ समय से अंदरखाने चल रहा था, लेकिन मामला तब तूल पकड़ गया जब शिकायत लिखित रूप में उच्च कार्यालय तक पहुंची।

जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा गठित जांच समिति में वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों को शामिल किया गया है, ताकि मामले की निष्पक्षता पर कोई प्रश्न न उठे। आदेश में यह भी उल्लेख है कि जांच दल को सभी संबंधित पक्षों के बयान दर्ज कर दस्तावेजों का परीक्षण करना होगा और तथ्यों के आधार पर अपनी स्पष्ट अनुशंसा देनी होगी।

इस घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग के भीतर प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की कार्यप्रणाली का सीधा असर अधीनस्थों के मनोबल और कार्यक्षमता पर पड़ता है। यदि मानसिक प्रताड़ना जैसे आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करेगा।

दूसरी ओर, यदि जांच में आरोप निराधार साबित होते हैं तो शिकायतकर्ता की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है। यही कारण है कि 5 दिनों की समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

नगर में चर्चा है कि शिक्षा विभाग जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कार्यरत अधिकारियों के बीच समन्वय और पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। किसी भी प्रकार का विवाद सीधे तौर पर शैक्षणिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में इस जांच को विभाग की साख से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

फिलहाल, पूरे मामले पर विभाग की निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो संबंधित अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, स्थानांतरण या अन्य प्रशासनिक कदम उठाए जा सकते हैं।

इस पूरे प्रकरण ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि अब विभागीय शिकायतों को अनदेखा नहीं किया जा रहा, बल्कि औपचारिक जांच के दायरे में लाकर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर बड़ा संदेश दे सकती है।

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