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जिले का हाल बेहाल, विकास की थमी रफ्तार और अधूरा डामरीकरण से बढ़ी परेशानी

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कबीरधाम जिला इन दिनों विकास के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच गहरे अंतर का उदाहरण बनता जा रहा है। जिले में नवीन सड़कों के निर्माण और खराब सड़कों के नवीनीकरण को लेकर बड़े पैमाने पर काम शुरू किए गए, लेकिन कई स्थानों पर स्थिति यह है कि सड़कों पर केवल गिट्टी डालकर कार्य अधूरा छोड़ दिया गया है। डामरीकरण की अंतिम परत समय पर नहीं चढ़ने से आम नागरिकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक, कई मार्गों पर असमतल सतह और ढीली गिट्टी के कारण धूल का गुबार दिनभर उड़ता रहता है। दोपहिया वाहन चालक फिसलन और संतुलन बिगड़ने के जोखिम में सफर करने को मजबूर हैं। चारपहिया वाहनों के टायर और सस्पेंशन पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। बाजार क्षेत्रों में व्यापार प्रभावित हो रहा है क्योंकि ग्राहक धूल और अव्यवस्था के कारण आवाजाही से बच रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां एंबुलेंस और अन्य आवश्यक सेवाओं के वाहन बाधित मार्गों से गुजरने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।

निर्माण एजेंसियों का तर्क है कि डामर की कीमतों में वृद्धि से परियोजनाओं की लागत बढ़ गई है, जिसके चलते कार्य की गति प्रभावित हुई है। हालांकि, प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन की दृष्टि से यह तर्क अधूरा प्रतीत होता है। यदि बाजार दरों में वृद्धि हुई थी तो परियोजनाओं के संशोधित प्राक्कलन और बजट पुनरीक्षण की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। अधूरा कार्य छोड़ देने से न केवल सार्वजनिक धन का दुरुपयोग होता है, बल्कि पहले से खराब सड़कों की स्थिति और बिगड़ जाती है।

गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं। कई स्थानों पर गिट्टी डालने के बाद समुचित रोलर नहीं चलाया गया, जिससे सड़क की बुनियाद मजबूत नहीं हो पाई। लोगो का मानना है कि प्रारंभिक चरण में ही यदि तकनीकी मानकों का पालन नहीं किया गया, तो भविष्य में सड़क की उम्र कम हो जाएगी और बार-बार मरम्मत पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। यह स्थिति दीर्घकालिक योजना और टिकाऊ विकास की अवधारणा के विपरीत है।

जिले में करोड़ों रुपये की लागत से स्वीकृत परियोजनाओं की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। कार्य प्रगति रिपोर्ट, गुणवत्ता परीक्षण और समयसीमा पालन की जानकारी सार्वजनिक मंचों पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने और विलंब पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

विकास केवल शिलान्यास और घोषणा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक प्रगति तभी मानी जाएगी जब सड़कें समय पर, गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित रूप में जनता को समर्पित हों। वर्तमान स्थिति में अधूरा डामरीकरण और बढ़ती लागत ने विकास की रफ्तार को थाम दिया है। यदि शीघ्र ही प्रभावी निरीक्षण, पारदर्शिता और जवाबदेही की ठोस व्यवस्था नहीं की गई, तो नवीन सड़कों का सपना कागजों तक सिमट कर रह जाएगा और जनता को धूल, जोखिम और असुविधा के बीच ही सफर करना पड़ेगा।

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