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उपचुनाव 2026: सत्ता की ताकत, सहानुभूति कार्ड और ‘रियासत फैक्टर’ से गरमाई सियासत

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कबीरधाम जिले की कवर्धा विधानसभा अंतर्गत आने वाली सहसपुर लोहारा नगर पंचायत में उपचुनाव की घोषणा होते ही सियासी तापमान चरम पर पहुंच गया है। पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष स्वर्गीय संतोष मिश्रा के आकस्मिक निधन से रिक्त हुई अध्यक्ष की कुर्सी अब राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी है। लंबे समय से जिस उपचुनाव की चर्चा थी, उसकी औपचारिक घोषणा होते ही नगर की गलियों से लेकर पार्टी कार्यालयों तक रणनीति, समीकरण और संभावित उम्मीदवारों को लेकर गहमागहमी तेज हो गई है।

कांग्रेस का दांव: युवा चेहरा, जमीनी पकड़

कांग्रेस ने वार्ड क्रमांक 13 से पूर्व पंचवर्षीय और वर्तमान पार्षद रोशन वैष्णव को अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर मुकाबले को औपचारिक रूप से त्रिकोणीय बनाने की पहल कर दी है। युवाओं और आम नागरिकों के बीच उनकी अच्छी पकड़ को कांग्रेस अपनी बड़ी ताकत मान रही है। संगठन का मानना है कि स्थानीय स्तर पर सक्रियता, व्यक्तिगत संपर्क और वार्ड आधारित नेटवर्क उन्हें बढ़त दिला सकता है। कांग्रेस इस चुनाव को केवल एक नगर पंचायत तक सीमित नहीं मान रही, बल्कि इसे कवर्धा विधानसभा क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रही है।

भाजपा में दावेदारों की भरमार, पर सहानुभूति भी बड़ा समीकरण

सत्तासीन भाजपा खेमे में टिकट को लेकर कई चेहरे सक्रिय हैं।

राधेकिशन सोनी—पूर्व सरपंच, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष और दो बार पार्षद—अपने अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर दावेदारी कर रहे हैं।

वहीं सौरभ श्रीवास्तव का नाम भी संभावित प्रत्याशी के रूप में उभर रहा है, जिनकी युवाओं और नागरिकों में मजबूत पकड़ बताई जाती है।

भाजपा के सामने सबसे बड़ा और संवेदनशील पहलू सहानुभूति का है। स्वर्गीय संतोष मिश्रा ने भाजपा की टिकट पर चुनाव जीतकर अध्यक्ष पद हासिल किया था। ऐसे में यदि पार्टी उनकी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारती है, तो सहानुभूति लहर भाजपा के पक्ष में निर्णायक कारक बन सकती है। स्थानीय राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव कई बार संगठन और समीकरण से भी भारी पड़ जाता है। भाजपा इस कार्ड को किस रूप में खेलती है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

यह उपचुनाव भाजपा के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि कवर्धा के विधायक विजय शर्मा वर्तमान में उप मुख्यमंत्री के साथ पंचायत, गृह एवं जेल जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वहीं राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र के सांसद संतोष पांडे भी इसी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। सत्ता और संगठन दोनों की ताकत भाजपा के साथ है, इसलिए पार्टी का दबदबा स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। हालांकि टिकट चयन में जरा सी असंतुष्टि बगावत का रूप ले सकती है।

निर्दलीय की दस्तक: अजय यादव फिर मैदान में

अजय यादव एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी समर में सक्रिय हैं। वे पूर्व में उपाध्यक्ष, सभापति और पार्षद रह चुके हैं। पिछले नगरीय निकाय चुनाव में निर्दलीय होते हुए भी उन्होंने लगभग 1300 वोटों की कड़ी टक्कर दी थी, जिसने बड़े दलों को चौंका दिया था। उनका व्यक्तिगत जनसंपर्क, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ उन्हें इस बार भी मजबूत चुनौतीकर्ता बना सकती है। यदि भाजपा या कांग्रेस में टिकट वितरण से असंतोष पनपता है, तो उसका सीधा लाभ निर्दलीय खेमे को मिल सकता है।

‘रियासत फैक्टर’ से बदलेगा खेल

सहसपुर लोहारा रियासत के राजा खड़क राज सिंह के चुनाव मैदान में उतरने की अटकलों ने राजनीतिक माहौल को और रोचक बना दिया है। वे पूर्व में नगर पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं और विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी से लड़ चुके हैं। उनकी धर्मपत्नी आकांक्षा देवी सिंह आम आदमी पार्टी की पदाधिकारी हैं और नगर में उनकी भी मजबूत पकड़ मानी जाती है।

नगरवासियों के बीच ‘महारानी’ की लोकप्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है। यदि राजा या रानी में से कोई भी चुनाव मैदान में उतरता है, तो यह चुनाव पूरी तरह बहुकोणीय हो सकता है। हालांकि अभी तक कोई अधिकृत घोषणा नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में ‘रियासत फैक्टर’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

जातीय गणित और सामाजिक समीकरण

नगर पंचायत सहसपुर लोहारा में यादव, साहू और पटेल समाज की अच्छी-खासी संख्या है। इन समाजों का वोट प्रतिशत चुनाव परिणामों को सीधे प्रभावित कर सकता है। सूत्रों के अनुसार पटेल समाज भी अपना उम्मीदवार उतारने पर विचार कर सकता है। इसके अलावा अन्य समाजों की भी निर्णायक भूमिका रहेगी। ऐसे में केवल पार्टी का नाम नहीं, बल्कि उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकृति और व्यक्तिगत छवि भी जीत की कुंजी बनेगी।

प्रतिष्ठा की जंग, रणनीति की परीक्षा

यह उपचुनाव अब केवल अध्यक्ष पद की लड़ाई नहीं रह गया है। यह सत्ता पक्ष के लिए अपनी पकड़ बनाए रखने की परीक्षा है, तो विपक्ष के लिए संगठनात्मक पुनरुत्थान का मौका। सहानुभूति कार्ड, रियासत का प्रभाव, जातीय समीकरण और व्यक्तिगत जनसंपर्क—चारों मोर्चों पर संघर्ष तेज है।

फिलहाल इतना तय है कि सहसपुर लोहारा का यह उपचुनाव हाई-वोल्टेज मुकाबले में बदल चुका है। जीत उसी की होगी जो भावनाओं, समीकरणों और रणनीति को संतुलित कर मतदाताओं के मन तक पहुंचने में सफल होगा। नगर की जनता अब देख रही है—कौन बनेगा अगला अध्यक्ष और किसके सिर सजेगा सहसपुर लोहारा का सियासी ताज।

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