कवर्धा। वन विकास निगम के तरेगांव रेंज में वन संपदा की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। मगरवाड़ा नदी किनारे 6-7 सितंबर की दरम्यानी रात कथित रूप से चार वर्षों पुराने सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई कर उन्हें पिकअप वाहन में भरकर ले जाने का मामला सामने आया है। घटनास्थल पर पिकअप वाहन के टायरों के स्पष्ट निशान भी बताए जा रहे हैं। सड़क किनारे हुई इस घटना ने निगम की रात्रिकालीन गश्त और निगरानी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है।
रात के अंधेरे में आरा चलने की आवाज, पेड़ों का गिरना और फिर पिकअप का लकड़ी लेकर जंगल से बाहर निकल जाना—यह पूरा घटनाक्रम यदि सामने आ रहा है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिम्मेदार वन अमला आखिर कहां था। सड़क से लगे इलाके में वाहन के निशान तक मौजूद हैं, फिर भी तस्करों की भनक समय रहते क्यों नहीं लग सकी?
स्थानीय स्तर पर क्षेत्र में सागौन की अवैध कटाई और लकड़ी की आवाजाही को लेकर लगातार शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप है कि रात के समय पेड़ों को काटकर पिकअप वाहनों से लकड़ी बाहर निकाली जाती है। इन आरोपों की विभागीय जांच जरूरी है। यदि घटनाओं की पुष्टि होती है तो यह केवल चार पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि वन संपदा की सुरक्षा में लगातार हो रही चूक का गंभीर मामला होगा।
सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई के तरीके पर है। अज्ञात आरोपियों के खिलाफ पीओआर दर्ज कर देने के बाद क्या जिम्मेदारी पूरी मान ली जाती है? पीओआर दर्ज करना प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन असली कार्रवाई तब मानी जाएगी जब कटाई करने वालों के साथ लकड़ी के परिवहन और खरीदी-बिक्री से जुड़े लोगों तक जांच पहुंचे।

मौके पर मौजूद बताए जा रहे पिकअप के टायरों के निशान जांच की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकते हैं। वाहन की पहचान, लकड़ी के संभावित मार्ग, कटाई में इस्तेमाल आरा और लकड़ी के खरीदारों तक जांच पहुंचाई जाए तो पूरे मामले की तस्वीर सामने आ सकती है। सवाल यह भी है कि चार सागौन के पेड़ काटने के बाद उनकी लकड़ी आखिर गई कहां।

मगरवाड़ा नदी किनारे सड़क से लगे क्षेत्र में यदि वन संपदा सुरक्षित नहीं है तो घने और अंदरूनी जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। सड़क किनारे यह हाल है तो बीहड़ जंगल भगवान भरोसे होने की आशंका से इनकार कैसे किया जाए।

वर्षों पुराने सागौन के पेड़ तैयार होने में लंबा समय लेते हैं। उनकी कटाई से वन संपदा को नुकसान के साथ आर्थिक क्षति की भी आशंका रहती है। इसलिए मामले को महज कागजी कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय प्रभावी जांच और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।



