सुनने में आया है कि सहसपुर लोहारा ब्लॉक में शासन के नियम अब फाइलों में विश्राम कर रहे हैं और कुर्सियां अपने हिसाब से फैसले सुना रही हैं। ऊपर से जारी आदेश कुछ कहते हैं, लेकिन नीचे पहुंचते-पहुंचते उनका अर्थ बदल जाता है। लगता है नियमों की भी एंट्री बिना “अनुमति” के नहीं होती।
राज्य स्तर के वर्षों पुराने आदेश साफ कहते हैं कि कार्यक्रम अधिकारी और सहायक परियोजना अधिकारी के प्रभार का निर्धारण नियमानुसार होगा, ताकि वित्तीय और प्रशासनिक जवाबदेही तय रहे। लेकिन पंचायत मंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में शायद अलग ही संविधान लागू है। यहां सहायक प्रोग्रामर कार्यक्रम अधिकारी बन जाते हैं, विकास अधिकारी जनपद पंचायत के सीईओ की कुर्सी संभाल लेते हैं और जिम्मेदार अफसर सब कुछ देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं।
कुर्सी के कान बताते हैं कि सक्षम अधिकारी भी कार्रवाई करने से ऐसे कांप रहे हैं, जैसे नियमों पर अमल करने से कोई बड़ा भूचाल आ जाएगा। सवाल यह नहीं कि प्रभार किसके पास है, सवाल यह है कि जब शासन के आदेश मौजूद हैं तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है या फिर नियम सिर्फ उन जिलों के लिए हैं जहां कोई “विशेष संरक्षण” नहीं है।
इन दिनों जिले के गलियारों में फुसफुसाहट है कि यहां इन दिनों “जेब भरो अभियान” ज्यादा सक्रिय है और “नियम पालन अभियान” छुट्टी पर चला गया है। फाइलें मुस्कुरा रही हैं, कुर्सियां खिलखिला रही हैं और नियम सिर पकड़कर बैठे हैं। जो अधिकारी नियमों की बात करता है, उसे समझाया जाता है कि “व्यवस्था ऐसे ही चलती है।”
अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन के आदेशों की ताकत ज्यादा है या स्थानीय व्यवस्था की पकड़। क्योंकि यदि पंचायत मंत्री के अपने निर्वाचन क्षेत्र में ही नियमों की धज्जियां उड़ती रहें और जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने से बचते रहें, तो फिर पूरे प्रदेश में नियम-कानून लागू करने का संदेश आखिर किसे दिया जा रहा है।
कुर्सी के कान कह रहे हैं— यहां कुर्सियां बदलती हैं, लेकिन व्यवस्था नहीं; आदेश निकलते हैं, पर पालन रास्ते में ही कहीं दम तोड़ देता है।