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कवर्धा के जंगलों में मौत का तांडव! तेंदुआ–बायसन शिकार से खुली वन सुरक्षा की पोल—कार्रवाई बाद में, सवाल पहले: जंगल की भरपाई कौन करेगा

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जिला एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण में गंभीर चूक के कारण राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है। बीते कुछ ही दिनों में तेंदुआ और बायसन (गौर) की मौतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कवर्धा के जंगल अब शिकारियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनते जा रहे हैं।
ताज़ा मामला सहसपुर लोहारा वन परिक्षेत्र का है, जहाँ सोनझरी परिसर में एक तेंदुआ मृत अवस्था में पाया गया। घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग ने पंचनामा, जप्ती और कानूनी कार्रवाई की औपचारिकताएँ पूरी कीं। जांच के दौरान 21.300 किलोग्राम जी.आई. तार बरामद किया गया, जिससे यह आशंका प्रबल होती है कि तेंदुए की मौत करंट प्रवाहित तार से शिकार के कारण हुई।

इसी तरह कवर्धा वन परिक्षेत्र के धवईपानी परिसर में दो नग बायसन (गौर) मृत पाए गए। जांच में सामने आया कि अवैध रूप से बिछाए गए करंट तार की चपेट में आकर इन विशाल और संरक्षित वन्यजीवों की जान चली गई। इस मामले में भले ही दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया हो और विभागीय कर्मचारियों को निलंबित किया गया हो, लेकिन वन्यजीवों की जान जाने का सच बदला नहीं जा सकता।
गंभीर बात यह है कि पिछले माह भोरमदेव अभ्यारण क्षेत्र में भी करंट से दो बायसन का शिकार हुआ था। लगातार हो रही ऐसी घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि अवैध शिकारी बेखौफ हैं, और वन सुरक्षा व्यवस्था में कहीं न कहीं बड़ी चूक मौजूद है।
वन विभाग द्वारा डॉग स्क्वॉड, फॉरेंसिक जांच, टावर डंप डेटा और निलंबन जैसी कार्रवाइयाँ की गईं, लेकिन सवाल यह है कि—
क्या हर मौत के बाद कार्रवाई ही अब वन्यजीव संरक्षण की नई परिभाषा बन गई है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, तेंदुआ और बायसन जैसे प्राणी जंगल के संतुलन की रीढ़ होते हैं। इनकी मौत केवल एक जीव का अंत नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा आघात है। ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि शिकारी पकड़ लेने से क्या जंगल को उसकी खोई जैव विविधता वापस मिल जाएगी?
आज स्थिति यह है कि आरोपी जेल में हैं, अधिकारी निलंबित हैं, लेकिन जंगल खामोश है—अपने रक्षक खो चुका है। वन्यजीवों की भरपाई संभव नहीं, फिर भी ऐसी घटनाएँ बार-बार हो रही हैं।
अब यह मामला केवल कवर्धा या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रह गया है।
यह राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है—
क्योंकि जब जंगल असुरक्षित हैं, तो प्रकृति का भविष्य भी असुरक्षित है।

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