कवर्धा (कबीरधाम)। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध पर्यटन और आस्था स्थल भोरमदेव मंदिर, जिसे प्रदेश का “खजुराहो” भी कहा जाता है, में हर वर्ष चैत कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को पारंपरिक भोरमदेव मेला और भोरमदेव महोत्सव आयोजित किया जाता है। यह आयोजन लंबे समय से क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख केंद्र रहा है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।
पिछले वर्षों में भोरमदेव महोत्सव तीन दिवसीय और बाद में दो दिवसीय स्वरूप में आयोजित होता रहा है, जिससे सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता था। इस वर्ष भारत दर्शन योजना के अंतर्गत परिसर में विकास कार्य चलने के कारण आयोजन को परंपरा को बनाए रखने के उद्देश्य से एक दिवसीय स्वरूप में आयोजित किया जा रहा है।
हालांकि स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय यह भी बना हुआ है कि महोत्सव की तैयारी और कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करने के लिए जो आवश्यक बैठक आयोजित की जाती है, वह इस वर्ष कार्यक्रम के महज चार दिन पहले रखी गई। जानकारों का मानना है कि इससे प्रचार-प्रसार के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया, जिसके कारण आमजन में महोत्सव को लेकर अपेक्षित उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है।
इसके अलावा महोत्सव के लिए जारी आमंत्रण पत्र को लेकर भी लोगों के बीच चर्चा है। आमंत्रण पत्र में अतिथियों के नाम इस प्रकार से छपे बताए जा रहे हैं कि कई लोगों को पढ़ने के बाद भी स्पष्ट रूप से समझ नहीं आ पा रहा है। लोगों का कहना है कि इस तरह की छोटी-छोटी व्यवस्थागत कमियां आयोजन की गंभीरता और प्रभाव को प्रभावित करती हैं।
स्थानीय नागरिकों और सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि भोरमदेव महोत्सव जैसे ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण आयोजन के लिए समय रहते तैयारी, व्यापक प्रचार-प्रसार और स्पष्ट जानकारी आवश्यक है, ताकि क्षेत्र की यह परंपरा पहले की तरह उत्साह और गरिमा के साथ आयोजित हो सके।