जिला शिक्षा विभाग की लापरवाही एक बार फिर उजागर हुई है। प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय भवनों की स्वीकृति के सालों बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया है। वर्ष 2016-17 और 2018-19 में चार स्कूल भवनों के लिए प्रशासनिक स्वीकृति और पूरी राशि जारी की गई, लेकिन 2025 तक स्थिति “अप्रारंभ” ही बनी हुई है। यह सीधे-सीधे जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता और निर्माण एजेंसियों की गैरजवाबदेही को दर्शाता है।
प्राप्त दस्तावेज के अनुसार
वर्ष 2016-17 में प्राथमिक शाला बसूला लुट के भवन निर्माण के लिए 10.38 लाख की राशि स्वीकृत कर मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत को निर्माण एजेंसी के रूप में दायित्व सौंपा गया।
वहीं 2018-19 में प्राथमिक शाला बेलमुड़ा, कुशीयारी और सिंगपुर के लिए भी 11.48 लाख रुपये प्रति स्कूल की राशि स्वीकृत कर जारी की गई।
लेकिन विडंबना यह है कि आज तक इन चारों भवनों का निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं हो सका है। बेलमुड़ा को छोड़कर शेष तीन विद्यालय वनांचल क्षेत्र में स्थित हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि आदिवासी अंचल के बच्चों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है।
बड़ी चौंकाने वाली बात यह है कि विकासखंड के नाम में त्रुटि होने के कारण कार्य को ‘अप्रारंभ’ बताया गया है। यह दर्शाता है कि जिला शिक्षा विभाग को अपने ही क्षेत्र की भौगोलिक जानकारी नहीं है। वर्षों बीतने के बावजूद अधिकारियों द्वारा आदेश में संशोधन नहीं कराया जाना विभागीय उदासीनता को प्रमाणित करता है।
उल्लेखनीय है कि इन विद्यालयों में भवन नहीं होने के कारण शिक्षा व्यवस्था वैकल्पिक रूप से संचालित की जा रही है, जिससे न केवल बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि यह उनके संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।
जानकार लोगों का कहना है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि ग्रामीण और वनांचल क्षेत्र के बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है। ऐसे मामलों में उच्च स्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
स्कूल भवन निर्माण में वर्षों की देरी, वनांचल के बच्चों के साथ हो रहा अन्याय, विकास की खोखली तस्वीर और सरकारी मशीनरी की संवेदनहीनता का एक जीवंत उदाहरण बन गया है।