भोरमदेव अभ्यारण्य में वन्य जीवों और औषधीय पौधों की रक्षा के लिए स्थानीय पशुपालकों को जंगल में मवेशी चराने से मना किया जा रहा है, परंतु सवाल यह है कि क्या सिर्फ भोरमदेव में ही यह जैव विविधता है? जबकि समूचा वनमंडल, विशेषकर पंडरिया, लोहारा, कुकदुर, रेंगाखार, खारा , तरेगांव सहित आसपास के जंगली क्षेत्रों में भी दुर्लभ वनस्पतियां और वन्य जीव मौजूद हैं। जिसे लगातार देख जा रहा है।
स्थानीय ग्रामीण पशुपालक तो पारंपरिक रूप से सीमित निस्तारी चराई करते हैं, लेकिन बाहर से आए भेड़, बकरी और ऊंट पालक भारी संख्या में जंगल में घुसकर लगातार जंगल की हरियाली और वन संपदा को नुकसान पहुँचा रहे हैं। ये चरवाहे दर्जनों झुंडों के साथ जंगल में कई दिनों तक डेरा डालते हैं और पेड़-पौधों से लेकर झाड़ियों तक को पूरी तरह चट कर जाते हैं। इससे न केवल प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है बल्कि वन्य जीवों के आवास क्षेत्र भी प्रभावित हो रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि इन बाहरी चरवाहों को रोकने की बजाय कई बार उन्हें वन विभाग के कुछ कर्मचारियों से अप्रत्यक्ष संरक्षण मिलता नजर आता है, जबकि स्थानीय ग्रामीणों पर सख्ती बरती जाती है। हाल ही में पंडरिया वन परिक्षेत्र के झूमर गांव के पास कुछ मुद्दे को लेकर ग्रामीणों और चरवाहों के बीच विवाद हो गया, जिसमें चार स्थानीय ग्रामीणों को जेल भेज दिया गया, जबकि बाहरी घुसपैठियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों ने मांग की है कि वन विभाग पूरे वनमंडल में चराई पर समान नीति बनाए। वन क्षेत्र की रक्षा केवल अभ्यारण्य तक सीमित न रहकर समूचे जंगल को संरक्षित करने की जरूरत है। साथ ही, बाहरी चरवाहों पर सख्त प्रतिबंध लगाकर वन सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
संवेदनशील जंगलों को नष्ट होने से बचाने का समय आ गया है – केवल नियम बनाने से नहीं, निष्पक्ष क्रियान्वयन से ही बचेगा जंगल।