महिला एवं बाल विकास विभाग, कबीरधाम के बोडला एकीकृत बाल विकास परियोजना अंतर्गत कार्यरत महिला पर्यवेक्षकों द्वारा अपने निवास विवरण में भ्रामक जानकारी देने का मामला प्रकाश में आया है। सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों के अनुसार, जिन पर्यवेक्षकों को नियुक्ति शर्तों के तहत अपने कार्यक्षेत्र/मुख्यालय में निवास करना अनिवार्य है, उन्होंने किरायानामा व निवास प्रमाण पत्रों में असंगत जानकारी दी है।
जिन पर्यवेक्षकों के विरुद्ध यह विसंगति उजागर हुई है, उनमें शामिल हैं
कु. लीला धुर्वे — सेक्टर: राजानवागांव | निवास: प्रोफेसर कालोनी एस पी आफिस के सामने , कवर्धा
शकुंतला टेकाम — सेक्टर: पौड़ी मुख्यालय | निवास: पौड़ी
ममता बूढ़ेक — सेक्टर: खडौदा कला | निवास: बोडला
इन पर्यवेक्षकों द्वारा प्रस्तुत किरायानामा व प्रमाणपत्रों के अनुसार, उन्होंने निवास स्थान मुख्यालय या सेक्टर के आसपास दर्शाया है, परंतु जमीनी स्तर पर वे अन्य स्थानों में निवासरत पाई गईं।
पर्यवेक्षक का कार्य एवं दायित्व
आंगनबाड़ी पर्यवेक्षक की भूमिका मूलभूत बाल पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं मातृसेवा योजनाओं की निगरानी, क्रियान्वयन व प्रतिवेदन सुनिश्चित करना है। पर्यवेक्षक का प्रमुख दायित्व होता है
अपने अधीनस्थ 20–30 आंगनबाड़ी केंद्रों की नियमित मॉनिटरिंग।
पोषण ट्रैकिंग, टीकाकरण, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और जनजागरूकता कार्यक्रमों की समीक्षा व मार्गदर्शन।
केंद्रों की उपस्थिति, स्टॉक रजिस्टर, बच्चों के वजन आदि की निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करना।
विभागीय योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
इसलिए, पर्यवेक्षक का मुख्यालय में नियमित रूप से उपलब्ध रहना और निरंतर क्षेत्रीय भ्रमण आवश्यक है। यदि पर्यवेक्षक किलोमीटरों दूर निवास करती हैं, तो उनकी उपस्थिति व निगरानी कार्य बाधित होता है — जिससे सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता व विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है।
नियमानुसार क्या है व्यवस्था
महिला एवं बाल विकास विभाग की नियुक्ति शर्तों के अनुसार, पर्यवेक्षक को अपने कार्यक्षेत्र या नियत मुख्यालय में ही निवास करना अनिवार्य है। विभाग द्वारा किरायानामा, निवास प्रमाण पत्र, और निगरानी पंजिका के आधार पर यह सत्यापित किया जाना होता है कि संबंधित अधिकारी कार्यक्षेत्र में उपस्थित रहती हैं या नहीं।
लेकिन इन दस्तावेजों से साफ होता है कि कई पर्यवेक्षक सिर्फ औपचारिकता पूरी करने फर्जी या अस्थायी निवास प्रमाण प्रस्तुत करती हैं, जबकि वास्तविक रूप से वे क्षेत्र से दूर निवासरत रहती हैं।
विभागीय चुप्पी या मिलीभगत
यह भी आश्चर्यजनक है कि विभागीय अधिकारी वर्षों से इस स्थिति से अवगत होने के बावजूद कोई कठोर कार्यवाही नहीं कर रहे हैं। इससे यह संदेह होता है कि या तो निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति हो रही है, या उच्च अधिकारियों की मौन सहमति प्राप्त है।
इस प्रकार की गड़बड़ियाँ महिला एवं बाल विकास विभाग की नीतियों और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। यदि पर्यवेक्षक ही क्षेत्र में उपस्थित नहीं रहेंगी, तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन, योजनाओं का सही क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक सेवाओं की पहुँच कैसे सुनिश्चित होगी ।
जनहित में यह अत्यंत आवश्यक है कि जिला प्रशासन व विभागीय अधिकारी इस मामले की गहन जाँच कर नियमों के उल्लंघन पर तत्काल कार्यवाही करें, ताकि सरकारी योजनाओं की गरिमा बनी रहे और ग्रामीण अंचलों की माताओं व बच्चों को उनका हक मिल सके।