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‘जनमन’ के नारों के बीच प्यासा स्वास्थ्य केंद्र: बैगा बाहुल्य रुखमिदादर में पानी संकट के साए में हो रहे प्रसव

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विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय के उत्थान के बड़े-बड़े दावों और योजनाओं के बीच रुखमिदादर गांव की हकीकत राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करती है। वनांचल में बसे इस बैगा बाहुल्य गांव का उप स्वास्थ्य केंद्र आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। भवन मौजूद है, कर्मचारी तैनात हैं, लेकिन पानी की किल्लत ने पूरी व्यवस्था को संकट में डाल रखा है।

तालाब सामने, अस्पताल प्यासा

उप स्वास्थ्य केंद्र के ठीक सामने एक बड़ा तालाब है, जो सूखा पड़ा है। अस्पताल के बाजू में लगा हैंडपंप जल स्तर नीचे चले जाने से लगभग निष्क्रिय हो चुका है। गांव में सोलर पैनल से मोटर द्वारा पानी सप्लाई की व्यवस्था तो है, लेकिन गिरते भू-जल स्तर के कारण वह भी नियमित और पर्याप्त नहीं। निस्तार के लिए भी मुश्किल से पानी मिल पा रहा है, ऐसे में अस्पताल में स्वच्छ जल की उपलब्धता गंभीर चुनौती बनी हुई है।

संकट के बीच कर्मियों की जिम्मेदारी

केंद्र में एक सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी सुश्री रैत्रि पोरते और ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजक अमिता माठले पदस्थ हैं। दोनों नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं और सीमित संसाधनों में भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पानी की भारी किल्लत के बावजूद वे सामान्य (नॉर्मल) प्रसव कराने का प्रयास करते हैं और कई मामलों में सफलतापूर्वक प्रसव भी करा लेते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी में विशेष पिछड़ी जनजातीय क्षेत्र में प्रसव जैसी संवेदनशील प्रक्रिया पानी के संकट के बीच कराना ही उपलब्धि माना जाए।स्वच्छता, संक्रमण नियंत्रण और सुरक्षित मातृत्व के मानकों के लिहाज से यह स्थिति चिंता पैदा करती है।

गंभीर मामलों में रेफर की मजबूरी

हालांकि जटिल या जोखिमपूर्ण मामलों में गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर दूर स्थित कुकदूर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रेफर करना पड़ता है। वनांचल की दूरी, परिवहन की कमी और समय पर सुविधा न मिल पाने का खतरा हर प्रसूता के साथ बना रहता है। बैगा समुदाय की महिलाएं पहले से ही कुपोषण और स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझती हैं, ऐसे में यह स्थिति और अधिक चिंताजनक हो जाती है।

‘जनमन’ बनाम जमीनी सच्चाई

विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए चलाई जा रही योजनाओं और अभियानों में स्वास्थ्य सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण की बात प्रमुखता से कही जाती है। लेकिन रुखमिदादर की तस्वीर इन दावों को कठघरे में खड़ा करती है।

यदि बैगा बाहुल्य गांव में एक उप स्वास्थ्य केंद्र को अब तक स्थायी जल स्रोत उपलब्ध नहीं कराया जा सका, तो योजनाओं के क्रियान्वयन की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या निरीक्षण केवल कागजों में हो रहे हैं? क्या दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों को केवल आंकड़ों में ‘कवर्ड’ दिखाया जा रहा है।

कर्मचारियों का जज्बा बनाम व्यवस्था की विफलता

यह स्पष्ट है कि स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। सीमित संसाधनों में भी वे सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन यह उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है, व्यवस्था की सफलता का नहीं।

जब पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता पूरी न हो, तो किसी भी स्वास्थ्य केंद्र को ‘पूर्ण रूप से कार्यशील’ मानना आत्म-प्रवंचना होगी। बैगा जैसी विशेष पिछड़ी जनजाति के जीवन और स्वास्थ्य के साथ यह समझौता राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय होना चाहिए।

अब जवाबदेही तय हो

रुखमिदादर का उप स्वास्थ्य केंद्र एक प्रतीक है—जहां एक ओर योजनाओं के दावे हैं, तो दूसरी ओर पानी के अभाव में जूझती मातृ स्वास्थ्य सेवाएं।

जरूरत है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग तत्काल संज्ञान लेकर स्थायी जल आपूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित करे। क्योंकि बैगा बाहुल्य इस गांव में मामला केवल एक भवन या एक योजना का नहीं, बल्कि देश की सबसे संवेदनशील और वंचित जनजातीय आबादी की माताओं और नवजातों के जीवन से जुड़ा है।

राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी विकास के दावों की विश्वसनीयता अब ऐसे ही गांवों की हकीकत से तय होगी।

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