धान खरीदी में गड़बड़ियों को कभी कीड़े-मकोड़ों और “मुसवा” पर थोपकर टालने की कोशिश हुई थी, लेकिन अब आंकड़े बता रहे हैं कि मामला प्राकृतिक नुकसान का नहीं, प्रशासनिक नाकामी और संभावित मिलीभगत का है। जिले के बाघामुड़ा धान उपार्जन केंद्र में 28 जनवरी 2026 को तहसीलदार और खाद्य निरीक्षक पंडरिया द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन में 1929.20 क्विंटल धान की कमी पाई गई—यह सीधा-सीधा करोड़ों रुपए के सार्वजनिक धन पर सवाल है।
कुछ ही दिन पहले लगभग 7 करोड़ रुपए की धान गायब होने के मामले में जिले की साख दांव पर लगी थी। राजनीतिक दबाव के बीच जिला विपणन अधिकारी को निलंबित किया गया, पर अब सामने आया नया मामला बताता है कि समस्या किसी एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि जब पूरा जिला पहले से अलर्ट मोड में था, तब भी निगरानी, भंडारण और रिकॉर्ड मिलान में इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई।
दस्तावेजों के मुताबिक बाघामुड़ा केंद्र के खरीदी प्रभारी जयराम चंद्राकर के खिलाफ एफआईआर और वसूली की कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन क्या 1929 क्विंटल धान की कमी केवल एक प्रभारी की लापरवाही से संभव है। खरीदी केंद्रों की दैनिक एंट्री, स्टॉक रजिस्टर, ऑनलाइन पोर्टल अपलोड, परिवहन पर्ची और गोदाम सत्यापन—इन सभी स्तरों पर हस्ताक्षर और अनुमोदन होते हैं। यदि कमी इतनी बड़ी है, तो जवाबदेही भी बहुस्तरीय होनी चाहिए।
यह मामला सिर्फ एक जिले का नहीं, बल्कि देशभर में चल रही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है। किसानों का भरोसा इस बात पर टिका है कि उनका धान सुरक्षित है और सरकार की खरीदी व्यवस्था पारदर्शी है। जब बार-बार “धान गायब” होने की खबरें आती हैं, तो सवाल उठता है—क्या निगरानी तंत्र केवल कागजों में सक्रिय है।
प्रभाव डालने वाले इस प्रकरण में अब जरूरी है:
सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समयबद्ध जांच
केंद्रवार स्टॉक का थर्ड-पार्टी ऑडिट
डिजिटल और भौतिक रिकॉर्ड का सार्वजनिक मिलान
दोषियों पर केवल निलंबन नहीं, दंडात्मक और आर्थिक जवाबदेही तय
कवर्धा की यह कहानी चेतावनी है—यदि जवाबदेही तय नहीं हुई तो “मुसवा” का नाम लेकर हर साल करोड़ों का खेल चलता रहेगा। अब देश देख रहा है कि जिम्मेदार कौन है और जिम्मेदारी कब तय होगी।