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सरकारी वृक्षारोपण योजना पर भारी लापरवाही! 50 हेक्टेयर में लगाए 55 हजार पौधे कागज़ों में, ज़मीन पर उजाड़ और कटाई

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छत्तीसगढ़ शासन के वन विभाग द्वारा हरित आवरण बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से संचालित सघन वृक्षारोपण योजना जमीनी हकीकत में दम तोड़ती नज़र आ रही है। सहसपुर लोहारा वन मण्डल, कवर्धा अंतर्गत कूप क्रमांक IV किरचाटोला (RDF), कक्ष क्रमांक 289, परिसर सूरजपुरा में वर्ष 2017-18 में किए गए वृक्षारोपण कार्य की स्थिति चिंताजनक और सरकारी दावों की पोल खोलने वाली है।

वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, संयुक्त वन प्रबंधन समिति धनौरा के माध्यम से यहां 50 हेक्टेयर क्षेत्र में 55,000 मिश्रित प्रजाति (3×3 मीटर अंतराल) के पौधे लगाए गए थे। कागज़ों में यह योजना पर्यावरणीय सफलता का उदाहरण हो सकती है, लेकिन मौके पर हालात इसके ठीक उलट हैं।

जमीनी सच्चाई:
उक्त रोपण क्षेत्र वन रक्षक निवास के समीप और सड़क किनारे स्थित है, जहां सुरक्षा के लिए लगाए गए कांटेदार तार और खंभे पूरी तरह तोड़ दिए गए हैं।
सड़क किनारे के छोटे-छोटे पौधे काट दिए गए,
कटे हुए स्थानों पर पुनः रोपण नहीं किया गया,
मिश्रित प्रजातियों के साथ लगाए गए सागौन के पौधे कटाई और चराई के शिकार हो चुके हैं।
स्थिति यह है कि अब वहां वृक्षारोपण कम और उजाड़ मैदान अधिक दिखाई देता है
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सवालों के घेरे में वन अमला
सबसे गंभीर बात यह है कि वन रक्षक निवास को देखकर साफ प्रतीत होता है कि वहां कोई भी कर्मचारी नियमित रूप से निवास नहीं करता। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि—
इतने बड़े रोपण क्षेत्र की निगरानी कौन कर रहा था?
करोड़ों रुपये की सरकारी योजना की सुरक्षा व्यवस्था क्यों ध्वस्त हुई?
पौधों की कटाई और चराई के दौरान वन अपराध दर्ज क्यों नहीं हुए?
 महत्व का मुद्दा
एक ओर देश जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और हरित भारत की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी वृक्षारोपण योजनाएं जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, लापरवाही और उदासीनता की भेंट चढ़ती जा रही हैं। यह मामला सिर्फ कवर्धा या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश में चल रही वृक्षारोपण योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
मांग
पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच,
जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई,
क्षतिग्रस्त क्षेत्र में तत्काल पुनः पौधारोपण,
और भविष्य में ऐसी योजनाओं की थर्ड पार्टी मॉनिटरिंग।
अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो “हरित भारत” का सपना सिर्फ फाइलों और फोटो तक ही सीमित रह जाएगा।

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