जिले के कलेक्टरेट परिसर में गुरुवार को जो तस्वीर सामने आई, उसने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया। महज चार लाख रुपए के बकाया भुगतान को लेकर न्यायालय के आदेश पर कुर्की की कार्रवाई करते हुए कोर्ट टीम ने कलेक्टर न्यायालय और खाद्य विभाग के दफ्तर से कंप्यूटर, टेबल और एसी तक जब्त कर लिए।
सरकारी दफ्तर में इस तरह की कार्रवाई अभूतपूर्व मानी जा रही है। आमतौर पर कुर्की की खबरें निजी व्यक्तियों या व्यापारियों से जुड़ी होती हैं, लेकिन यहां खुद जिला प्रशासन का सबसे प्रमुख कार्यालय कार्रवाई की जद में आ गया। वर्षों से लंबित भुगतान के मामले में संबंधित केटरिंग संचालक ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। आदेश के बाद टीम सीधे कलेक्टरेट पहुंची और कार्यालयीन सामग्री जब्त कर बाहर रख दी गई।
कार्रवाई के दौरान दफ्तरों में अफरा-तफरी का माहौल रहा। जिन कंप्यूटरों पर शासन के आदेश, योजनाओं की फाइलें और संवेदनशील डेटा संचालित होता है, वे जमीन पर पड़े नजर आए। यह दृश्य न केवल प्रशासनिक लापरवाही की कहानी कह रहा था, बल्कि वित्तीय अनुशासन की पोल भी खोल रहा था।
बताया जा रहा है कि पूर्व में भी भुगतान के लिए समय दिया गया था, लेकिन राशि का निपटान नहीं हुआ। अंततः सख्त रुख अपनाते हुए कुर्की की कार्रवाई की गई। हड़कंप मचने के बाद अधिकारियों ने 9 मई तक भुगतान का आश्वासन दिया, जिसके बाद फिलहाल कार्रवाई स्थगित की गई है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब आम नागरिकों पर बकाया वसूली के लिए सख्ती दिखाई जाती है, तो क्या सरकारी तंत्र स्वयं कानून से ऊपर है । यदि कलेक्टरेट जैसी संस्था में भुगतान को लेकर यह स्थिति है, तो अन्य विभागों की व्यवस्था कैसी होगी।
यह घटना केवल चार लाख रुपए का विवाद नहीं, बल्कि जवाबदेही और प्रशासनिक विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुकी है। अब निगाहें इस पर हैं कि जिम्मेदार कौन ठहराया जाएगा — और क्या इस शर्मनाक स्थिति से कोई सबक लिया जाएगा या नहीं।