मछली पालन विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार एक्सोटिक मागूर (Clarias gariepinus) एवं बिग हेड (Hypophthalmichthys nobilis) जैसी विदेशी प्रजातियों के बीज उत्पादन, संवर्धन, पालन, परिवहन, विपणन एवं आयात-निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है।
यह अधिसूचना मत्स्य अधिनियम 2006 एवं जल जैव विविधता संरक्षण नीतियों के तहत लागू की गई है। इन मछलियों को देशी जैवविविधता और पर्यावरण के लिए हानिकारक माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रजातियां देशी मछलियों को विस्थापित कर देती हैं, साथ ही जल स्रोतों की पारिस्थितिकीय संरचना को भी नुकसान पहुंचाती हैं।
हालांकि, प्रतिबंध के बावजूद राज्य के कई जिलों में इन मछलियों की अवैध बिक्री धड़ल्ले से जारी है। स्थानीय बाजारों में प्रतिदिन मागूर और बिग हेड की बिक्री देखी जा रही है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से संबंधित विभाग और प्रशासनिक अधिकारी इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, कई निजी मत्स्य पालक अब भी इन मछलियों का बीज उत्पादित कर रहे हैं, जिन्हें ट्रांसपोर्ट कर अन्य जिलों और राज्यों में भेजा जा रहा है। यह न केवल अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि राज्य की जैव सुरक्षा के साथ खिलवाड़ भी है।
छत्तीसगढ़ मत्स्य पालन विभाग ने अपनी अधिसूचना में स्पष्ट उल्लेख किया है कि –“कोई भी मछुआ, व्यक्ति, संस्था, समूह, केंद्र अथवा राज्य शासन, इन प्रतिबंधित प्रजातियों का बीज उत्पादन, पालन अथवा संवर्धन नहीं करेगा। यदि कोई उल्लंघन पाया गया तो उसके विरुद्ध मत्स्य अधिनियम एवं पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
मांग उठ रही है
ऐसे अवैध कारोबारियों पर कठोर कार्रवाई हो
बाजारों की नियमित निगरानी हो
प्रतिबंध की व्यापक प्रचार-प्रसार हो
पारंपरिक मछुआरों को संरक्षण और वैकल्पिक प्रजातियों की सुविधा दी जाए
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन की अधिसूचना के बावजूद इस खुले उल्लंघन पर कब तक मौन साधा जाता है, और क्या वास्तव में कार्रवाई होती है या यह सिर्फ कागजों तक सीमित रहता है।