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राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र से जुड़े संरक्षण तंत्र का भंडाफोड़: बैगा जनजाति के 13 नाबालिग बंधुआ श्रम से मुक्त, 8 आरोपी सलाखों के पीछे — अब जिम्मेदारी तय होगी

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विशेष संरक्षित बैगा जनजाति के 13 मासूम बच्चों को बंधुआ मजदूरी और बाल तस्करी के शिकंजे से मुक्त कर कबीरधाम पुलिस ने एक ऐसे संगठित शोषण तंत्र का खुलासा किया है, जिसकी कड़ियां प्रभावशाली संपर्कों तक पहुंचने की आशंका जता रही हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों ने यह संकेत दिया है कि पूरा नेटवर्क संरक्षण और प्रभाव के भरोसे संचालित हो रहा था।

थाना भोरमदेव में अपराध क्रमांक 29/2026 के तहत भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 143(5), 146, 61(2), किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 व 79, बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम की धारा 3 व 14 तथा बंधुआ मजदूर प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976 की धारा 16, 17 व 18 सहित गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।

रेस्क्यू अभियान के दौरान ग्राम भलपहरी, खरहट्टा पाण्डातराई, सारंगपुर कला, कान्हाभैरा और दशरंगपुर में दबिश देकर 8 से 15 वर्ष आयु के बच्चों को मुक्त कराया गया। बच्चों से 10–12 घंटे तक मवेशी चराने और श्रमसाध्य कार्य कराए जाते थे, जबकि उनके अभिभावकों को मात्र 1000 से 2000 रुपये मासिक का लालच दिया गया था। यह सीधे तौर पर बाल अधिकारों, मानवाधिकारों और अनुसूचित जनजाति संरक्षण कानूनों का उल्लंघन है।

मामले में 8 आरोपी — रामू यादव, रवि यादव, धनीराम यादव, सर्वन यादव, दीपक यादव, रामफल यादव, राम बिहारी यादव और रुपेश यादव — गिरफ्तार किए गए हैं। परंतु प्रश्न केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है।

जिम्मेदारी किसकी

क्या स्थानीय प्रशासन और श्रम विभाग को क्षेत्र में चल रहे इस अवैध श्रम की भनक नहीं थी।

क्या ग्राम स्तरीय तंत्र, पंचायत प्रतिनिधि और निगरानी समितियां निष्क्रिय रहीं।

यदि प्रभावशाली व्यक्तियों का संरक्षण सामने आता है, तो क्या उन पर भी समान रूप से कार्रवाई होगी।

इस प्रकरण में केवल आरोपियों को जेल भेज देना पर्याप्त नहीं होगा। बाल तस्करी और बंधुआ मजदूरी जैसे संगठित अपराध बिना संरक्षण और प्रशासनिक शिथिलता के संभव नहीं होते। जिम्मेदारी तय करना अब अनिवार्य है—चाहे वह स्थानीय स्तर पर हो या प्रभाव के ऊपरी गलियारों तक जाती हो।

बच्चों को बाल कल्याण समिति के आदेश पर सुरक्षित बालगृह में रखा गया है, जहां पुनर्वास और काउंसलिंग जारी है।

यह मामला केवल 13 बच्चों की मुक्ति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित जनजातीय अधिकारों की परीक्षा है। यदि प्रभाव के नाम पर कानून को मोड़ने की कोशिश हुई, तो यह राष्ट्र की न्याय व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती होगी।

संदेश स्पष्ट है—बाल शोषण के खिलाफ अब प्रतीकात्मक नहीं, संरचनात्मक कार्रवाई होगी। जिम्मेदारों की पहचान और दंड ही इस अभियान की असली सफलता तय करेगा।

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