कवर्धा , प्रकृति की गोद में बसे भोरमदेव अभ्यारण्य क्षेत्र, जो जैव विविधता और हरियाली के लिए जाना जाता है, वहां इन दिनों पर्यावरण का चीरहरण खुलेआम हो रहा है। अभ्यारण्य क्षेत्र से सटे कई गांवों में धड़ल्ले से अवैध ईंट भट्टों का निर्माण किया जा रहा है। इन भट्टों में बड़ी मात्रा में जंगली लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है और हरे-भरे पेड़ों, खासकर महुआ जैसे बहुपयोगी वृक्षों को बेरहमी से काटा जा रहा है।
जिम्मेदारों की जानकारी में सब कुछ, फिर भी खामोशी
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इन गतिविधियों की जानकारी वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों को भलीभांति है, लेकिन रसूखदारों की मिलीभगत के चलते कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। अधिकारी भले ही स्थिति की गंभीरता से वाकिफ हों, लेकिन प्रभावशाली लोगों के सामने वे बेबस नजर आते हैं।
दर्जनों अवैध ईंट भट्टे, पर्यावरण पर संकट
माना जा रहा है कि क्षेत्र में दर्जनों अवैध ईंट भट्टे संचालित हो रहे हैं, जिनका उपयोग न केवल निजी निर्माण कार्यों में हो रहा है बल्कि कई सरकारी योजनाओं में भी इन्हीं ईंटों का उपयोग किया जा रहा है। इससे जहां पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है, वहीं गरीब और स्थानीय निवासियों को भी इसका आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है।
गरीबों को नहीं राहत, कार्रवाई में दोहरा मापदंड
चौंकाने वाली बात यह है कि जब भी खानापूर्ति के नाम पर कोई कार्रवाई होती है, तो उसका खामियाजा केवल उन गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ता है, जो अपनी जरूरतों के लिए सीमित स्तर पर ईंट भट्ठा चलाते हैं। प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत जिम्मेदार नहीं जुटा पाते।
प्रशासन की निष्क्रियता पर उठते सवाल
भोरमदेव जैसे संरक्षित क्षेत्र में अवैध गतिविधियों का खुलेआम संचालन न केवल पर्यावरणीय कानूनों की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि यह प्रशासन की निष्क्रियता और भ्रष्ट तंत्र की भी पोल खोलता है। अब जरूरत इस बात की है कि शासन और प्रशासन सख्त कदम उठाए, और इस अमूल्य वन संपदा की रक्षा के लिए प्रभावी कार्रवाई करे।