नगर पंचायत के एकमात्र तालाब के सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। आरटीआई से प्राप्त प्राक्कलन (एस्टीमेट) सार्वजनिक होने के बाद दावा किया गया है कि जमीनी स्तर पर हो रहा निर्माण स्वीकृत मानकों से मेल नहीं खाता। जिस परियोजना का उद्देश्य जल संरक्षण, सौंदर्य संवर्धन और नागरिकों को बेहतर सार्वजनिक स्थल उपलब्ध कराना था, वही अब कथित कमीशनखोरी और गुणवत्ता से समझौते के आरोपों में घिर गई है।
आरटीआई में कुछ, ज़मीन पर कुछ
दस्तावेजों में जिन सामग्रियों, मोटाई, गहराई और तकनीकी मानकों का उल्लेख है, मौके पर उनका पालन न होने का आरोप है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्राक्कलन में उच्च गुणवत्ता की सामग्री दर्शाई गई, लेकिन कार्यस्थल पर निम्न स्तर की सामग्री उपयोग में लाई जा रही है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल शासकीय धन की हानि है, बल्कि सार्वजनिक भरोसे के साथ भी खिलवाड़ है।
निगरानी तंत्र पर प्रश्नचिह्न
निर्माण कार्यों में तकनीकी अधिकारियों की नियमित उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है, ताकि गुणवत्ता और मापदंडों की पुष्टि हो सके। लेकिन आरोप है कि जिम्मेदार इंजीनियर और अधिकारी फील्ड निरीक्षण से नदारद रहते हैं। निगरानी के अभाव में ठेकेदार को मनमानी की खुली छूट मिल रही है। माप पुस्तिका का संधारण, गुणवत्ता परीक्षण और कार्य की प्रगति रिपोर्ट को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
23 प्रतिशत ‘कट’ की चर्चा
मामले का सबसे गंभीर पहलू कथित 23 प्रतिशत कमीशन को लेकर है। नगर में चर्चा है कि विकास कार्यों में ‘कट’ की संस्कृति गहरी जड़ें जमा चुकी है। आरोप है कि कार्यादेश देने से लेकर भुगतान तक में प्रतिशत तय होते हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि जांच में यह तथ्य सामने आते हैं, तो यह मामला बड़े प्रशासनिक संकट का रूप ले सकता है।
दो सत्ता केंद्रों की खींचतान
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि प्रशासनिक और राजनीतिक नेतृत्व के बीच समन्वय की कमी है। कुछ लोग इसे “दो समानांतर सत्ता केंद्रों” की स्थिति बता रहे हैं। कहा जा रहा है कि कई विकास कार्यों के आदेश इसलिए लंबित हैं क्योंकि कथित ‘कट’ को लेकर सहमति नहीं बन पा रही। यदि ऐसा है, तो यह सीधे-सीधे नगर विकास की रफ्तार पर ब्रेक है।
प्राक्कलन की अनदेखी, भविष्य पर खतरा
जानकारों का मानना है कि तालाब जैसे जलस्रोत के सौंदर्यीकरण में तकनीकी मानकों से समझौता करना भविष्य में भारी पड़ सकता है। घटिया निर्माण से ढांचा कमजोर होगा, मरम्मत की लागत बढ़ेगी और जल संरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी गंभीर चूक है।
जनता की मांग: निष्पक्ष जांच हो
नगरवासियों ने पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच, थर्ड पार्टी निरीक्षण और वित्तीय ऑडिट की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि आरोप निराधार हैं तो पारदर्शी जांच से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए, और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
अब सवाल सीधा है कि क्या तालाब सौंदर्यीकरण वास्तव में विकास का प्रतीक बनेगा या फिर कमीशनखोरी का काला अध्याय? प्रशासन की अगली कार्रवाई ही तय करेगी कि जनता का भरोसा बचता है या डूब जाता है।