आवश्यक वस्तु अधिनियम, वन अधिनियम और जीएसटी कानून की उड़ रही धज्जियां, संरक्षण, कमीशन या प्रशासनिक लापरवाही—जवाबदेही कौन तय करेगा
कबीरधाम जिले के सीमावर्ती गांवों और साप्ताहिक हाट बाजारों में इन दिनों बाहरी राज्यों के व्यापारियों का दबदबा देखने को मिल रहा है। विशेष रूप से वन उपज जैसे महुआ, तेंदूपत्ता, सालबीज के अलावा अब सरकारी उचित मूल्य की दुकानों से मिलने वाले चावलों की भी खुलेआम अवैध खरीद-फरोख्त हो रही है।
छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से राशनकार्ड धारियों को जून, जुलाई और अगस्त महीने का एकमुश्त चावल वितरण किया जा रहा है, लेकिन इस वितरण का लाभ आमजन से अधिक अवैध व्यापार करने वाले उठा रहे हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में बाहरी व्यापारी खुलेआम इन चावलों की खरीदी करते देखे जा सकते हैं, जिससे सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नियमों की अनदेखी, टैक्स चोरी और प्रशासनिक चुप्पी
मंडी अधिनियम के तहत हर व्यापारिक लेन-देन पर मंडी टैक्स देय होता है, वहीं जीएसटी कानूनों के अनुसार राज्य और केंद्र सरकार को राजस्व मिलना चाहिए। परंतु यहां स्टेट जीएसटी और सेंट्रल जीएसटी की सीधी चोरी हो रही है। आवश्यक वस्तु अधिनियम और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत इस तरह की खरीद-फरोख्त कानून का उल्लंघन है, फिर भी संबंधित विभाग और अधिकारी “मौन साधे” हुए हैं।
संरक्षण या कमीशनखोरी
प्रश्न यह उठता है कि क्या यह पूरा खेल किसी संरक्षण के तहत चल रहा है? कहीं यह नेटवर्क कमीशनखोरी की उपज तो नहीं? या फिर सीमावर्ती क्षेत्रों में कानून का भय ही खत्म हो गया है? प्रशासनिक निष्क्रियता आम जनता के बीच यही संदेश देती है कि या तो सिस्टम में मिलीभगत है या फिर डर और दबाव में कार्रवाई नहीं हो रही।
सरकार को तत्काल लेना चाहिए संज्ञान
इस गंभीर स्थिति में राज्य सरकार, वन विभाग, खाद्य विभाग, वाणिज्य कर विभाग एवं जिला प्रशासन को समन्वय कर अविलंब संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए। नियमों और अधिनियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई हो।