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सरपंच पति की दबंगई: JCB से तोड़फोड़, महिला-पुरुषों से मारपीट… पुलिस चौकी ने नहीं लिखी रिपोर्ट, SP को दिए आवेदन पर भी अब तक कार्रवाई नहीं!

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कवर्धा
थाना कुंडा के दामापुर चौकी अंतर्गत अधीनस्थ ग्राम सुकली गोविंद में सरपंच पति एवं पुलिस आरक्षक अनुज दिवाकर की दबंगई का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। एक गरीब परिवार के घर को जबरन जेसीबी से तोड़ने की कोशिश, महिलाओं से गाली-गलौच और मारपीट, और फिर चौकी द्वारा रिपोर्ट दर्ज करने से इंकार – यह पूरा प्रकरण अब पुलिसिया संरक्षकीय दबाव और निष्क्रियता की बानगी बन गया है।

पीड़ित डूमन प्रसाद बंजारे ने बताया कि दिनांक 6 मई को दोपहर लगभग 12 बजे ग्राम सुकली गोविंद में उनकी पत्नी सुमित्रा बाई, पुत्री प्रतिमा और पुत्र कलप सिंह के साथ सरपंच पति अनुज दिवाकर (आरक्षक, थाना कुंडा) एवं उसके सहयोगियों – प्रेमदास, बालकदास, शत्रुहन, अनिल (उपसरपंच), और सुनील – ने न केवल गाली-गलौच की बल्कि घर तोड़ने का प्रयास भी किया। विरोध करने पर तीनों के साथ मारपीट की गई, कपड़े फाड़े गए और गला दबाकर जान से मारने की कोशिश की गई।
घटना के बाद 112 डायल कर पुलिस को बुलाया गया, जिन्होंने घायलों को अस्पताल पहुंचाया और फिर जिला अस्पताल कवर्धा रेफर किया। लेकिन जब पीड़ित परिवार ने चौकी दामापुर में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाही, तो पुलिस ने यह कहते हुए रिपोर्ट लेने से साफ इंकार कर दिया कि “पुलिस वाले के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लेंगे”, और सभी घायलों को चौकी लाने की शर्त रख दी।
पुलिस अधीक्षक को दिया गया था आवेदन, अब तक नहीं हुई कार्रवाई
घटना की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित डूमन प्रसाद बंजारे ने 7 मई 2025 को पुलिस अधीक्षक कबीरधाम को लिखित आवेदन सौंपा, लेकिन हैरानी की बात है कि अब तक न तो प्राथमिकी दर्ज की गई है, और न ही आरोपियों पर कोई वैधानिक कार्रवाई हुई है। इससे पीड़ित परिवार में भय और निराशा दोनों है।
गांव में खौफ का माहौल, कोई गवाही को तैयार नहीं
पीड़ित पक्ष का कहना है कि अनुज दिवाकर थाना कुंडा में आरक्षक है और उसकी पत्नी ग्राम पंचायत की सरपंच। दोनों के राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख के कारण ग्रामीणों में भय है और कोई भी गवाही देने को तैयार नहीं है। पीड़ित ने बताया कि गांव में अनुज दिवाकर पुलिस की वर्दी और पद का दुरुपयोग करते हुए खुलेआम लोगों को धमकाता है।
प्रशासनिक चुप्पी पर उठ रहे सवाल
इस मामले में न सिर्फ एक आरक्षक द्वारा कानून हाथ में लेने और सत्ता के दुरुपयोग का आरोप है, बल्कि पुलिस तंत्र की निष्क्रियता और पक्षपातपूर्ण रवैये की भी गूंज है। पुलिस अधीक्षक को सीधे आवेदन दिए जाने के बावजूद लगभग दो महीने बीतने पर भी कार्रवाई न होना, पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है।
अब सवाल यह है कि क्या गरीब और कमजोर वर्ग को न्याय तभी मिलेगा जब कोई बड़ी घटना घटे या फिर सत्ता और वर्दी का गठजोड़ ऐसे ही आम जन को कुचलता रहेगा।
जनता और प्रशासन को जवाब चाहिए।

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