एक ओर सरकार बच्चों में कुपोषण मिटाने के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर वनांचल के बैगा बहुल ग्राम सरोदा दादर की आंगनवाड़ी केंद्र खुद कुपोषण और उपेक्षा की शिकार है।
एकीकृत बाल विकास परियोजना चिल्फी के अंतर्गत संचालित यह केंद्र आज भी खुद के भवन से वंचित है, और पुरानी, जर्जर हो चुकी प्राथमिक शाला के भवन में अस्थायी रूप से संचालित किया जा रहा है। भवन की हालत इतनी खराब है कि उसमें शौचालय तक नहीं है, जिससे छोटे बच्चों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है।
2 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जलेश्वरी मरावी से प्राप्त जानकारी के अनुसार, केंद्र में 3 से 6 वर्ष आयु वर्ग के 19 बच्चे, 0 से 3 वर्ष के 8 बच्चे, 4 गर्भवती महिलाएं और 2 शिशुवती माताएं पंजीकृत हैं। इनमें से 2 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, जो शासन की पोषण पुनर्वास योजनाओं की असल स्थिति को दर्शाते हैं।
सिस्टम मौन, अधिकारी ग़ैरहाज़िर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा सेक्टर पर्यवेक्षक के माध्यम से कई बार विभागीय अधिकारियों को मौजूदा स्थिति की जानकारी दी गई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है। पिछले गर्मी के मौसम में परियोजना अधिकारी नमन देशमुख ने ज़रूर निरीक्षण किया था, पर निरीक्षण के बाद भी कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।
विशेष पिछड़ी जनजाति के साथ अन्याय यह विडंबना ही है कि सरकार जिन बैगा जैसे विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए विशेष योजनाएं चला रही है, उन्हीं समुदायों तक उन योजनाओं का लाभ समय पर नहीं पहुँच पा रहा है। सरोदा दादर जैसे वनांचल ग्राम में पोषण, स्वच्छता और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं, जो कि बच्चों के भविष्य के लिए सबसे जरूरी हैं।
स्थानीय लोगों की गुहार ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि सरोदा दादर में स्थायी और सुविधायुक्त आंगनवाड़ी भवन शीघ्र बनाया जाए, जिसमें शौचालय, रसोई, पेयजल और सुरक्षित बच्चों के बैठने की व्यवस्था हो।
जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं होगी, तब तक कुपोषण और उपेक्षा की मार बैगा समुदाय के बच्चों को पीछे धकेलती रहेगी, और यह सारा तंत्र केवल फाइलों तक सीमित रहेगा ।