राज्य के बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने और स्कूल में उनकी उपस्थिति बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई मध्याह्न भोजन योजना कबीरधाम जिले में लापरवाही और मनमानी का शिकार होती नज़र आ रही है। पंडरिया और बोडला विकासखण्ड—जहां विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय के बच्चे अधिक संख्या में पढ़ते हैं—में यह स्थिति सबसे गंभीर है।
सूत्रों के अनुसार, जिले के कई स्कूलों में मिड-डे मील का संचालन एक ही महिला स्व-सहायता समूह (SHG) के पास है, जिसके पास चार से लेकर दस तक स्कूलों की जिम्मेदारी है। इन स्कूलों की दूरी समूह के मुख्यालय से 10 से 15 किलोमीटर तक है, जिसके चलते भोजन की गुणवत्ता और समय पर वितरण पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मीनू में विविधता की जगह आलू और सोयाबड़ी का एकरस भोजन परोसा जा रहा है। हरी सब्जियां, दाल जैसी पोषक सामग्री बच्चों की थाली से लगभग गायब हो चुकी है। स्कूल के शिक्षक भी समूह के दबाव में चुप्पी साधे रहते हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी इस गड़बड़ी से वाकिफ होने के बावजूद कार्रवाई करने में असमर्थ दिखते हैं।
योजना का उद्देश्य और लाभ
मध्याह्न भोजन योजना का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना, कुपोषण की रोकथाम, बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति में सुधार और शिक्षा में नियमित उपस्थिति को प्रोत्साहित करना है। यह योजना विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने में सहायक सिद्ध हुई है।
लेकिन कबीरधाम की जमीनी हकीकत में—
मीनू से पौष्टिक विविधता गायब।
जिम्मेदारी का असंतुलित बंटवारा, एक समूह के पास कई स्कूल।
दूरस्थ स्थान से भोजन आने के कारण ताजगी और गुणवत्ता पर असर।
शिक्षक और अधिकारी दबाव में या लाचार।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना के मूल उद्देश्य को बचाना है तो जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल सख्त निगरानी और कार्रवाई करनी होगी, ताकि बच्चे वास्तव में पौष्टिक भोजन पा सकें और यह योजना कागजों में नहीं, बल्कि थालियों में सफल दिखे।