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नियुक्ति में बड़ा खुलासा: गलत प्रतिशत, अस्थाई प्रमाण पत्र और नियम विरुद्ध स्थानांतरण – जांच की मांग तेज

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स्वास्थ्य विभाग में हुई नियुक्ति अब एक बड़े विवाद का कारण बन गई है। दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ है कि चयनित अभ्यर्थी ने 13 मई 2016 को जिला मेडिकल बोर्ड, राजनांदगांव से जारी विकलांगता प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था। इस प्रमाण पत्र में केवल 40% विकलांगता अंकित है, जबकि नियुक्ति आदेश में इसे 45% दर्शाया गया।
प्रमाण पत्र की वैधता खत्म
महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्तुत किया गया विकलांगता प्रमाण पत्र अस्थाई (Temporary) स्वरूप का था, जिसकी वैध अवधि केवल तीन वर्ष यानी 30 अप्रैल 2019 तक थी। नियुक्ति आदेश में स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि स्थाई (Permanent) प्रमाण पत्र अनिवार्य होगा, लेकिन अभ्यर्थी ने न तो नया प्रमाण पत्र बनवाया और न ही विभाग में प्रस्तुत किया। वैधता समाप्त होने के बाद भी सेवा का लाभ लेना सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है।
स्थानांतरण पर भी सवाल
नियुक्ति की मूल शर्तों में यह साफ लिखा था कि अभ्यर्थी नियुक्ति स्थान पर ही सेवा देगा और मनमाना परिवर्तन/स्थानांतरण स्वीकार्य नहीं होगा। इसके बावजूद उक्त अभ्यर्थी ने कबीरधाम जिले से अन्य जिले में स्थानांतरण करा लिया। यह कदम शासन-प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
नियमों का उल्लंघन और कानूनी पहलू
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 और सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत गलत या अधूरा दस्तावेज देना नियुक्ति निरस्तीकरण का आधार है।
असत्य या अस्थाई प्रमाण पत्र के आधार पर सेवा का लाभ उठाना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज़ का प्रयोग) के तहत भी ऐसी गड़बड़ी अपराध मानी जा सकती है।
जांच की मांग
स्थानीय नागरिकों, जागरूक संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि –
1. नियुक्ति आदेश और प्रमाण पत्र में अंतर कैसे हुआ?
2. वैधता खत्म होने के बाद भी सेवा का लाभ क्यों दिया गया?
3. स्थानांतरण नियम विरुद्ध होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
इन सवालों के जवाब बिना उच्च स्तरीय जांच के संभव नहीं हैं। जनता का मानना है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में भी पात्र अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन होता रहेगा।
यह पूरा प्रकरण न केवल नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी संदेह पैदा करता है। अब देखना होगा कि विभाग इस पर कब और कैसी कार्रवाई करता है ।

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