बलौदा बाजार। कृषि प्रधान जिले बलौदा बाजार में इस बार धान की बोनी के बीच खाद संकट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। बढ़ते हुए रकबे और खेती में आवश्यक उर्वरकों की मांग के बावजूद यूरिया व डीएपी की उपलब्धता घट गई है। हालात यह है कि जिन खादों की सरकारी दर 266 रुपये प्रति बोरी है, वही किसानों को 700 से 800 रुपये तक चुकाकर बाजार से खरीदनी पड़ रही है।
निरीक्षण महज़ खानापूर्ति
कृषि विभाग और राजस्व विभाग की संयुक्त टीमें लगातार उर्वरक विक्रेताओं की दुकानों का निरीक्षण कर रही हैं, लेकिन कार्रवाई सिर्फ नोटिस जारी करने तक सीमित है। अब तक किसी भी व्यापारी पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही नहीं होने से खाद व्यापारियों के हौसले बुलंद हैं। किसान संगठन सवाल उठा रहे हैं कि जब बार-बार जांच में गड़बड़ी सामने आ रही है, तो लाइसेंस निलंबन व आपराधिक कार्रवाई जैसी कठोर कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?
कानून है, लेकिन पालन का अभाव
उर्वरक (नियंत्रण) आदेश 1985 और आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत अधिक मूल्य वसूलने, स्टॉक छिपाने या कालाबाज़ारी करने वाले व्यापारियों पर सीधी सजा और लाइसेंस निरस्तीकरण का प्रावधान है। वहीं कीटनाशक अधिनियम 1968 के तहत कीटनाशकों व रासायनिक खादों की गुणवत्ता और मूल्य नियंत्रण का जिम्मा प्रशासन का है। इसके बावजूद प्रशासनिक सख्ती न होने के कारण व्यापारी मनमानी कर रहे हैं।
किसान दोहरी मार के शिकार
धान की बुआई बढ़ने से उर्वरकों की मांग अत्यधिक है। समय पर खाद न मिलने और महंगे दामों पर खरीदने से किसानों की लागत दोगुनी हो रही है। पहले ही डीजल, मजदूरी और बीज के दाम बढ़े हुए हैं, ऐसे में खाद की कालाबाज़ारी से किसानों की कमर टूट रही है।
प्रशासन से सख्ती की मांग
किसान संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि जिला प्रशासन महज़ जांच की औपचारिकता से आगे बढ़कर दोषी व्यापारियों पर कठोर कार्रवाई करे। साथ ही यूरिया-डीएपी की कालाबाज़ारी रोकने के लिए स्टॉक व वितरण की पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
अगर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो धान की फसल पर सीधा असर पड़ेगा और किसान आर्थिक संकट में और ज्यादा फंस जाएंगे।