सरकार भले ही आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे और घोषणाएँ करती हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। जिले के नगर पंचायत पांडातराई स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वर्षों से चली आ रही नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी ने स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है।
यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लगभग 10 हजार की आबादी और 20 से अधिक गांवों की स्वास्थ्य जिम्मेदारी संभालता है, लेकिन विडंबना यह है कि इतना बड़ा दायित्व सिर्फ दो नर्सों के भरोसे चल रहा है। स्वीकृत पद तीन नर्सों के हैं, किंतु लंबे अरसे से एक पद खाली पड़ा हुआ है।
स्थिति यह है कि यदि किसी कारणवश एक नर्स को अवकाश पर जाना पड़ता है, तो पूरा अस्पताल मात्र एक नर्स के सहारे चलाया जाता है। जच्चा-बच्चा डिलीवरी, आकस्मिक प्रसव या गंभीर मरीजों की स्थिति में परिजन भगवान भरोसे रह जाते हैं। इमरजेंसी में इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं होने से मरीजों की जान पर बन आती है।
नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण मरीजों की देखभाल बुरी तरह प्रभावित हो रही है। अन्य कर्मचारियों पर अतिरिक्त कार्यभार और मानसिक दबाव बढ़ गया है। किसी बड़ी दुर्घटना या आपात स्थिति में अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है।
चकाचक भवन में संचालित यह स्वास्थ्य केंद्र सुविधाओं के घोर अभाव से जूझ रहा है। दुर्घटना के शिकार मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद तुरंत बाहर रेफर कर दिया जाता है। शाम 5 बजे से 8 बजे तक अस्पताल में किसी भी स्वास्थ्य कर्मी की मौजूदगी नहीं रहती, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
इस गंभीर समस्या से स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन पूरी तरह अवगत हैं। मीडिया में कई बार इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जा चुका है, इसके बावजूद आज तक परमानेंट नर्स की नियुक्ति नहीं की गई। स्थानीय लोगों में चर्चा है कि प्रशासन द्वारा जानबूझकर इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जनता के हितों की नुमाइंदगी करने वाले जनप्रतिनिधियों ने भी नर्स की कमी को दूर कराने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया। वर्षों से पद रिक्त होने का खामियाजा आम जनता भुगत रही है।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार और जिम्मेदार अधिकारी पांडातराई की जनता को सुरक्षित और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराएंगे, या फिर यह अस्पताल यूँ ही दो नर्सों के भरोसे चलता रहेगा?