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बलौदाबाजार में धान खरीदी पर सवालों की बारिश: तहसीलदार ने पहले रोकी खरीदी, फिर फोन पर दिलवा दी अनुमति!

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बलौदाबाजार जिला में धान खरीदी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कलेक्टर के सख्त निर्देशों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर नियमों को ताक पर रखे जाने का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला लवन तहसील अंतर्गत धान खरीदी केंद्र गीदौला से जुड़ा है। खेत मालिक शिवानंद अग्रवाल पिता भोला आनंद अग्रवाल और श्रद्धानंद अग्रवाल से संबंधित धान खरीदी में अधिया प्रथा की पुष्टि होने के बाद भी खरीदी कराए जाने का आरोप है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, धान की आवक के समय अग्रवाल पक्ष द्वारा मौके पर फोटो खिंचवाया गया और इसके बाद वे वहां से चले गए। कुछ देर बाद मौके पर पहुंचे लवन तहसीलदार को केवल अधिया पर खेती करने वाले लोग ही मौजूद मिले। पूछताछ में दोनों अधियारों ने स्वीकार किया कि एक ने 9 क्विंटल और दूसरे ने 10 क्विंटल की दर से अधिया लिया है, जबकि शेष पूरा उत्पादन खेत मालिक अग्रवाल परिवार का बताया गया।
अधिया की स्पष्ट जानकारी सामने आने के बाद तहसीलदार ने नियमों का हवाला देते हुए खरीदी न करने के निर्देश दिए और धान खरीदी केंद्र गीदौला में तत्काल पंचनामा भी बनवाया गया। मौके पर खरीदी रोक दी गई, लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
आरोप है कि बाद में उपार्जन केंद्र प्रभारी को फोन पर निर्देश देकर उसी धान की खरीदी करा दी गई, जिसे पहले नियम विरुद्ध बताकर रोका गया था। यह दोहरी कार्यवाही अब पूरे मामले को संदिग्ध बना रही है।
रिकॉर्ड के अनुसार,
शिवानंद/भोला आनंद अग्रवाल के नाम से 361 कट्टा धान का टोकन जारी था
वहीं श्रद्धानंद अग्रवाल के नाम से 133 कट्टा धान का टोकन दर्ज है
एक ओर जिला कलेक्टर ने अवैध धान खरीदी रोकने और सख्त सत्यापन के लिए विशेष टीम गठित की है, तो दूसरी ओर इस तरह की घटनाएं प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अनदेखी की ओर इशारा कर रही हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब अधिया की पुष्टि के बाद खरीदी रोकी गई थी, तो फिर फोन पर किसके दबाव में खरीदी की अनुमति दी गई? ।
क्या नियम केवल दिखावे के लिए हैं, या फिर रसूखदारों के लिए अलग व्यवस्था लागू है।
यह मामला न सिर्फ धान खरीदी प्रणाली की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की भी कठोर परीक्षा ले रहा है।

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