एक ओर देश बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देता है, वहीं छत्तीसगढ़ के तरेगांव जंगल क्षेत्र से आई यह घटना पूरे प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
मिली जानकारी के अनुसार, तरेगांव जंगल क्षेत्र की एक नाबालिग आदिवासी बालिका, जो वर्तमान में मानसिक दिव्यांगता की स्थिति में है, लगभग तीन वर्ष के एक बच्चे की मां है, जबकि एक वर्ष पूर्व जन्मे दूसरे नवजात को कथित तौर पर तालाब में फेंक दिया गया। यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज, प्रशासन और कानून—तीनों की सामूहिक विफलता को उजागर करती है।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि पहले बच्चे के जन्म के समय गांव में कथित तौर पर बैठक भी हुई, बावजूद इसके बाल संरक्षण से जुड़े किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या संस्था ने हस्तक्षेप नहीं किया। न तो एकीकृत बाल विकास परियोजना, न ही बाल कल्याण समिति, और न ही पुलिस या महिला-बाल विभाग ने समय रहते संज्ञान लिया।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह मामला POCSO अधिनियम 2012, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम 2015, IPC की गंभीर धाराओं, तथा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के दायरे में आता है। इसके बावजूद, अब तक किसी ठोस कार्रवाई की पुष्टि नहीं हो सकी है।
आज वह बालिका मानसिक, शारीरिक पीड़ा और गरीबी बीच जीवन जीने को मजबूर है, जबकि उसका मासूम बच्चा भी संरक्षण और पुनर्वास के अधिकार से वंचित है।
यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं है—
यह सवाल करता है:
क्या नाबालिग आदिवासी बच्चियों की ज़िंदगी इतनी सस्ती है।
क्या बाल संरक्षण कानून केवल कागज़ों के लिए हैं।
क्या प्रशासन तब ही जागेगा जब मामला मीडिया या अदालत की दहलीज पर पहुंचेगा।
अब आवश्यकता है कि उच्च स्तरीय जांच, पीड़िता और बच्चों का तत्काल संरक्षण, तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए—वरना यह चुप्पी आने वाले समय में और भी अपराधों को जन्म देगी।
“इस समाचार का उद्देश्य पीड़िता की पहचान उजागर करना नहीं, बल्कि उसे न्याय, संरक्षण और सरकारी सहायता दिलाने की दिशा में प्रशासन का ध्यान आकर्षित करना है।”