छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। खरीदी समाप्त होने में अब केवल दो दिन शेष हैं, लेकिन इसी निर्णायक वक्त में खरीदी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर और असहज करने वाले सवाल खड़े हो गए हैं। सीमावर्ती जिलों से लगातार धान की अवैध आवाजाही, खरीदी समितियों में एक ही धान की बार-बार एंट्री (रिसाइक्लिंग) और कथित संरक्षण प्राप्त नेटवर्क ने राज्य की पूरी प्रणाली को संदेह के घेरे में ला दिया है।
राज्य सरकार ने किसानों को सम्मान देने के उद्देश्य से देश में पहली बार 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी की व्यवस्था लागू की है। इसके अतिरिक्त कृषक उन्नति योजना के माध्यम से किसानों को प्रत्यक्ष लाभ दिया जा रहा है। बावजूद इसके, ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
सीमावर्ती जिलों से धान की खुली आवाजाही
सूत्रों के मुताबिक, पड़ोसी राज्यों की सीमाओं से धान रात-दिन ट्रकों, पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर रहा है। यह धान स्थानीय किसानों के नाम पर समितियों में खपाया जा रहा है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि कई स्थानों पर यह गतिविधि खरीदी केंद्रों के बेहद नजदीक हो रही है, इसके बावजूद प्रभावी रोकथाम दिखाई नहीं देती।
खरीदी समितियों में ‘रिसाइक्लिंग’ का खेल
खरीदी समितियों में एक ही धान को अलग-अलग किसानों के नाम पर बार-बार तौल कर भुगतान कराने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। इसे स्थानीय स्तर पर “धान रिसाइक्लिंग” कहा जा रहा है। यह खेल न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि ईमानदार किसानों के हिस्से का अनाज और भुगतान भी रोक रहा है।
माफिया के संपर्क में अधिकारियों की मौजूदगी
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन व्यापारियों और व्यक्तियों पर धान खरीदी में गड़बड़ी के आरोप लगते रहे हैं, उनके ठिकानों के आसपास प्रशासनिक और विभागीय अधिकारियों की नियमित आवाजाही देखी जा रही है।
इससे यह सवाल उठ रहा है कि कहीं यह चुप्पी जानबूझकर साधी गई निष्क्रियता तो नहीं।
मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल से खुल सकता है पूरा नेटवर्क
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि धान खरीदी से जुड़े कर्मचारियों, परिवहनकर्ताओं और संदिग्ध व्यक्तियों की मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो सीमापार धान, रिसाइक्लिंग और संरक्षण देने वाले पूरे नेटवर्क का तकनीकी साक्ष्यों के साथ खुलासा संभव है।
सरकार की मंशा पर सवाल, छवि पर असर
छत्तीसगढ़ सरकार की मंशा किसानों को आर्थिक सुरक्षा और सम्मान देने की रही है, लेकिन वर्तमान हालात में यह संगठित गड़बड़ी न केवल सरकार की नीतियों को कमजोर कर रही है, बल्कि राज्य की छवि को भी राष्ट्रीय स्तर पर कठघरे में खड़ा कर रही है।
ईमानदार किसान सबसे बड़ा पीड़ित
खरीदी केंद्रों पर कतारों में खड़े वास्तविक किसान, सीमित टोकन, भुगतान में देरी और बार-बार की तकनीकी अड़चनों से जूझ रहे हैं, जबकि कथित नेटवर्क बिना बाधा के धान खपाने में सफल दिखाई देता है। इससे किसानों में गहरी नाराजगी और अविश्वास बढ़ रहा है।
अब भी वक्त है…
जब खरीदी प्रक्रिया समाप्त होने में केवल दो दिन बचे हैं, तब यह देखना अहम होगा कि
क्या शासन-प्रशासन सख्त और पारदर्शी कार्रवाई करता है।
या फिर यह मामला भी जांच समितियों और फाइलों तक सीमित रह जाएगा।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ₹3100 MSP पर धान खरीदी की ऐतिहासिक पहल पर यह सबसे गंभीर सवाल बन सकता है।