औद्योगिक क्षेत्र में संचालित अनिमेष इस्पात प्राइवेट लिमिटेड एक बार फिर पर्यावरणीय लापरवाही के आरोपों से घिर गई है। फैक्ट्री की चिमनी से निकल रहे काले धुएं का असर अब केवल हवा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आसपास लगे पेड़-पौधों की पत्तियों पर मोटी काली परत के रूप में साफ दिखाई दे रहा है। हरियाली पर जमी कालिख इस बात का संकेत है कि उत्सर्जन नियंत्रण के दावे धरातल पर पूरी तरह खरे नहीं उतर रहे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सुबह और शाम के समय चिमनी से घना काला धुआं निकलता है, जो धीरे-धीरे आसपास के वातावरण में फैलकर पेड़ों की पत्तियों पर जम जाता है। कई पेड़ों की पत्तियां हरे रंग की बजाय धूसर और काली पड़ चुकी हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, जब हवा में कार्बन कण, फ्लाई ऐश और अन्य प्रदूषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं, तो वे पत्तियों की सतह पर चिपक जाते हैं। इससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है, पौधों की वृद्धि रुकती है और दीर्घकाल में हरियाली खत्म होने लगती है।
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। आसपास के रहवासियों का आरोप है कि घरों की छतों, खिड़कियों और वाहनों पर भी महीन काली धूल की परत जम जाती है। लोगों को आंखों में जलन, गले में खराश और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यदि पेड़-पौधों पर इतनी स्पष्ट कालिख दिखाई दे रही है, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हवा में प्रदूषण का स्तर कितना अधिक होगा।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि बलौदा बाजार में पर्यावरण विभाग का स्थानीय कार्यालय ही उपलब्ध नहीं है। ऐसे में आम नागरिक अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए भटकने को मजबूर हैं। लोगों का कहना है कि शिकायत करने के लिए उन्हें दूसरे जिलों या संभागीय कार्यालय का सहारा लेना पड़ता है, जिससे अधिकांश मामले दर्ज ही नहीं हो पाते। स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र की अनुपस्थिति से औद्योगिक इकाइयों की जवाबदेही भी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत निर्धारित उत्सर्जन सीमा का पालन करना हर उद्योग के लिए अनिवार्य है। इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर (ESP), बैग फिल्टर और अन्य प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का प्रभावी संचालन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। यदि इसके बावजूद चिमनी से काला धुआं निकल रहा है और उसका असर पेड़ों तक स्पष्ट है, तो यह गंभीर जांच का विषय है।
औद्योगिक विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। पेड़ों पर जमी कालिख और शिकायत तंत्र की अनुपलब्धता दोनों मिलकर एक चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या संबंधित उच्च अधिकारी इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर वायु गुणवत्ता की जांच कराएंगे और स्थानीय स्तर पर पर्यावरण कार्यालय की स्थापना पर विचार करेंगे, या फिर काला धुआं यूं ही वातावरण और भरोसे दोनों को प्रदूषित करता रहेगा।