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तालाब की आड़ में ‘खनन राज’: सवाल पूछने वाले छात्र की पिटाई, जिम्मेदार विभाग खामोश वीडियो वायरल होते ही खुली परतें; खनिज और राजस्व विभाग की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

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 क्षेत्र में तालाब खुदाई के नाम पर चल रहे कथित अवैध उत्खनन का मामला उस समय तूल पकड़ गया, जब सवाल उठाने पहुंचे एक छात्र की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। घटना ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि खनिज और राजस्व विभाग की निष्क्रियता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

बताया जा रहा है कि कुंडा थाना क्षेत्र के बघर्रा गांव में जेसीबी और हाइवा की मदद से बड़े पैमाने पर तालाब से मिट्टी  खुदाई की जा रही थी। ग्रामीणों के मुताबिक यह कार्य “तालाब गहरीकरण” के नाम पर हो रहा था, लेकिन मौके की तस्वीरें कुछ और कहानी बयां करती हैं। जब एक छात्र ने मौके पर पहुंचकर अनुमति और दस्तावेजों की जानकारी मांगी, तो कथित रूप से ठेकेदार पक्ष के लोगों ने उसके साथ मारपीट की।

घटना का वीडियो सामने आते ही पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए हैं—एक पक्ष का कहना है कि छात्र ने काम रुकवाने की धमकी दी, जबकि दूसरे पक्ष का आरोप है कि बिना वैध अनुमति के उत्खनन किया जा रहा था और सवाल उठाने पर हमला किया गया।

खनन की आड़ में खेल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि तालाब खुदाई की आड़ में मुरूम और मिट्टी का परिवहन खुलेआम किया जा रहा था। यदि कार्य विधिवत स्वीकृत था, तो खनिज विभाग द्वारा जारी अनुमति, रॉयल्टी पर्ची और परिवहन चालान सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए। राजस्व विभाग की निगरानी कहाँ थी।
क्षेत्र में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि छोटे कार्यों की आड़ में बड़े पैमाने पर खनन होता है, और संबंधित विभाग या तो अनजान बने रहते हैं या फिर कागजी कार्रवाई तक सीमित रहते हैं।

जिम्मेदार नदारत, कार्रवाई अधर में
घटना के बाद प्रशासन ने जांच की बात तो कही है, लेकिन अब तक किसी बड़े अधिकारी का स्पष्ट बयान सामने नहीं आया। खनिज विभाग और राजस्व अमले की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है—क्या बिना मिलीभगत के भारी मशीनरी और परिवहन संभव है क्या मौके पर निरीक्षण किया गया था।

यदि सब कुछ नियमों के तहत था, तो पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई गई? और यदि नियमों की अनदेखी हुई, तो जिम्मेदारी तय कब होगी।

युवा पर हमला, संदेश किसे
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक छात्र, जिसने कथित अनियमितता पर सवाल उठाया, उसे मारपीट का सामना करना पड़ा। क्या यह संदेश देने की कोशिश है कि “सवाल मत पूछो”यदि ऐसा है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ गंभीर संकेत है।

सख्त जांच और जवाबदेही जरूरी
मामला केवल एक मारपीट का नहीं, बल्कि व्यवस्था पर भरोसे का है। आवश्यकता है कि:
उत्खनन से संबंधित सभी अनुमति पत्र और रॉयल्टी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।
खनिज और राजस्व विभाग की भूमिका की स्वतंत्र जांच हो।

दोषियों पर कठोर कार्रवाई कर उदाहरण पेश किया जाए।

तालाब गहरीकरण विकास का कार्य हो सकता है, लेकिन यदि उसी की आड़ में संसाधनों की लूट हो और सवाल पूछने वालों की पिटाई, तो यह “विकास” नहीं, बल्कि खनन माफियाओं के राज का संकेत है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कितनी पारदर्शिता और सख्ती दिखाता है।

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