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दक्ष के अहंकार पर शिव का मौन प्रहार: कथा में गूंजा संदेश, समय का सदुपयोग ही सच्ची साधना

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पंडरिया, हरिनाला स्थित तिवारी काम्प्लेक्स में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन बुधवार को कथा व्यास पंडित श्री भूषण उपाध्याय (मुंगेली) ने भगवान शिव, माता सती और राजा दक्ष के प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण एवं प्रेरणादायी वर्णन किया। कथा के आयोजक नरेंद्र तिवारी के सान्निध्य में चल रहे इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर कथा श्रवण कर रहे हैं।
कथा व्यास पंडित भूषण उपाध्याय ने कहा कि भगवान शिव ऐसे देव हैं जो कभी किसी के शत्रु नहीं होते। वे सदैव लोककल्याण, तप और ध्यान में लीन रहते हैं। शिव का चरित्र हमें यह सिखाता है कि जीवन में समय का सदुपयोग ही सबसे बड़ी साधना है। जो व्यक्ति अपना समय दूसरों की आलोचना, ईर्ष्या और विवाद में नष्ट करता है, वह स्वयं अपने विकास का मार्ग अवरुद्ध कर लेता है।
कथा के दौरान राजा दक्ष और भगवान शिव के प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया गया कि प्रजापति दक्ष अपने पद और प्रतिष्ठा के अहंकार में इतने डूब गए कि उन्होंने भगवान शिव का अपमान कर दिया। इसके बावजूद शिव ने कभी प्रतिशोध की भावना नहीं रखी। 
उन्होंने अपने समय और ऊर्जा को किसी के विरोध में नहीं, बल्कि सृष्टि के कल्याण में लगाया। यही कारण है कि भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है।
व्यासपीठ से बताया गया कि जब राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया और भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया, तब माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं। वहां भगवान शिव के प्रति अपमानजनक व्यवहार देखकर वे अत्यंत व्यथित हुईं और योगाग्नि में अपने शरीर का त्याग कर दिया। इस घटना ने राजा दक्ष के अहंकार को चूर-चूर कर दिया और अंततः उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ।
कथा में कहा गया कि यह प्रसंग केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए भी एक बड़ा संदेश है। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार मिलने पर यदि व्यक्ति अहंकारी हो जाता है तो उसका पतन निश्चित है। वहीं विनम्रता, धैर्य और क्षमा का मार्ग अपनाने वाला व्यक्ति सम्मान और सफलता प्राप्त करता है।
कथा स्थल पर भगवान शिव के जयघोष और भक्ति गीतों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर जीवन में अहंकार त्यागने तथा समय का सदुपयोग करने का संकल्प लिया।
कथा का संदेश:
“भगवान शिव किसी के दुश्मन नहीं होते। वे हमें सिखाते हैं कि समय को व्यर्थ विवादों में नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और लोककल्याण में लगाना चाहिए। अहंकार का अंत निश्चित है, जबकि विनम्रता व्यक्ति को महान बनाती है।”

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