गांवों में रोजगार की गारंटी देने वाली मनरेगा योजना कबीरधाम जिले में करोड़ों रुपये के लंबित भुगतान के चलते सवालों के घेरे में है। जिले के चार विकासखंडों में करीब 4 करोड़ रुपये मजदूरी मद और 13 करोड़ रुपये से अधिक सामग्री मद का भुगतान लंबित बताया जा रहा है। यानी कुल 17 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भुगतान प्रक्रिया में अटकी है। इनमें कुछ कार्यों की राशि नौ माह से अधिक समय से लंबित है, जबकि कुछ हितग्राहियों को भुगतान के लिए एक वर्ष से भी अधिक समय से इंतजार करना पड़ रहा है।
मनरेगा का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को गांव में रोजगार उपलब्ध कराना और उनकी आजीविका को आर्थिक सहारा देना है। ऐसे में काम के बाद भुगतान में महीनों की देरी केवल तकनीकी या प्रक्रियागत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह योजना के क्रियान्वयन और प्रशासनिक निगरानी से जुड़ा सवाल बन जाती है।
चार विकासखंड, करोड़ों की देनदारी
कबीरधाम जिले में कवर्धा, पंडरिया, बोड़ला और सहसपुर लोहारा विकासखंड हैं। इन क्षेत्रों में मनरेगा के तहत रोजगारमूलक और निर्माण कार्य संचालित होते हैं। करोड़ों रुपये की लंबित राशि के बीच अब यह स्पष्ट होना जरूरी है कि किस विकासखंड, पंचायत और कार्य में कितनी राशि अटकी है।
विशेष चिंता उन मामलों को लेकर है, जिनमें भुगतान नौ माह से अधिक समय से लंबित बताया जा रहा है। एक वर्ष से अधिक समय से राशि की प्रतीक्षा कर रहे हितग्राहियों के मामले में भी भुगतान किस स्तर पर रुका है और इसके निराकरण में कितना समय लगेगा, इसका स्पष्ट जवाब जरूरी है।
वीजी-राम-जी में मजदूरी जारी, सामग्री भुगतान ठप
योजना के परिवर्तित नाम वीजी-राम-जी के तहत मजदूरी भुगतान होने की जानकारी सामने आ रही है, लेकिन सामग्री मद में अब तक भुगतान नहीं होने की स्थिति बताई जा रही है। विभागीय स्तर पर इसके पीछे टीडीएस और तकनीकी समस्याओं का पेच बताया जा रहा है।
तकनीकी अड़चन प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जब भुगतान लंबे समय तक रुका रहे तो सवाल समाधान की समयसीमा पर उठता है। सामग्री भुगतान लंबित रहने से स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं और कार्यों से जुड़े लोगों की पूंजी भी फंस सकती है। ऐसे में प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और लंबित भुगतान कब तक जारी होगा।
नियमों में समयबद्ध भुगतान का प्रावधान
मनरेगा कानून में श्रमिकों को निर्धारित समयसीमा में मजदूरी भुगतान का प्रावधान है। विलंब की स्थिति में नियमानुसार मुआवजे की व्यवस्था भी है। इसलिए लंबे समय से लंबित मजदूरी भुगतान की स्थिति प्रशासनिक समीक्षा और जवाबदेही का विषय बनती है।
मजदूरी में देरी का सीधा असर ग्रामीण परिवारों की नकदी उपलब्धता पर पड़ सकता है। दूसरी ओर सामग्री भुगतान रुकने से विकास कार्यों से जुड़े स्थानीय कारोबारियों की कार्यशील पूंजी प्रभावित हो सकती है।
पलायन रोकने के मकसद पर भी सवाल
मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराकर मजबूरी में होने वाले पलायन की परिस्थितियों को कम करने का माध्यम है। लेकिन यदि गांव में काम मिलने के बाद मेहनताना समय पर न पहुंचे तो आर्थिक दबाव बढ़ सकता है और परिवारों को दूसरे क्षेत्रों में रोजगार तलाशने की जरूरत महसूस हो सकती है।
अब सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की लंबित राशि के निराकरण के लिए प्रशासन की समयबद्ध कार्ययोजना क्या है। विकासखंडवार लंबित मजदूरी और सामग्री भुगतान की स्थिति, भुगतान रुकने का कारण और उसके समाधान की समयसीमा सार्वजनिक किए जाने की जरूरत है।
मनरेगा में काम के बदले समय पर भुगतान योजना की विश्वसनीयता की बुनियादी शर्त है। 17 करोड़ रुपये से अधिक की कथित लंबित राशि के बीच अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन कब तक भुगतान की इस अड़चन को दूर कर मजदूरों, हितग्राहियों और सामग्री प्रदाताओं को राहत देता है।