जिला कार्यालय के सभागार में आयोजित समय-सीमा की समीक्षा बैठक में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—हर आवेदन को विभागीय जिम्मेदारी समझते हुए खुद निगरानी में देखें और यदि आवेदन किसी अन्य विभाग का हो, तो ट्रांसफर करने से पहले उसकी पूरी जांच करें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कोई भी आवेदन बगैर परीक्षण के अस्वीकृत न हो और जिन मामलों में निराकरण संभव नहीं है, उन्हें ठोस कारण के साथ आवेदक को सूचित करें।
खरीफ सीजन को लेकर भी कलेक्टर पूरी तरह सतर्क दिखे। उन्होंने खाद और बीज के भंडारण की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देशित किया कि गर्मी के बाद धान की बुवाई से पहले हर जरूरी इंतजाम पुख्ता हों। किसान को न लाइन में लगना पड़े, न परेशान होना पड़े—यही लक्ष्य रखा गया।
मिनी स्टेडियम हो या सीसी रोड, मंच निर्माण हो या महतारी सदन—हर घोषणा सिर्फ कागजों में नहीं, धरातल पर दिखे, इसके लिए सतत मॉनिटरिंग के निर्देश दिए गए।
एग्रीस्टेक परियोजना के तहत फार्मर आईडी निर्माण को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने किसानों के हित में इसे तेजी से पूरा करने का आग्रह किया। सिंचाई परियोजनाओं के भू-अर्जन मामलों पर भी उन्होंने राजस्व विभाग को सख्त रुख अपनाने को कहा।
प्रधानमंत्री आवास, अमृत सरोवर, और मुख्यमंत्री जनदर्शन की भी गहन समीक्षा हुई। खास बात यह रही कि इस बार नामांतरण और बंटवारे के मामलों पर भी विशेष जोर दिया गया। “स्पष्ट प्रकरणों को लटकाना नहीं है, हल करना है,” यह स्पष्ट संदेश कलेक्टर ने दिया।
शासन के लिए एक योजना हो सकती है, लेकिन आमजन के लिए वह उम्मीद होती है। कलेक्टर वर्मा की यह शैली बताती है कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति और मानवीय दृष्टिकोण साथ चलें, तो सुशासन महज़ नारा नहीं, एक अनुभव बन जाता है।