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कबीरधाम में प्रधान पाठक को 20 साल की सजा, पद से बर्खास्त

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कवर्धा , एक शिक्षक, जिसे समाज में ‘गुरु’ के रूप में आदर दिया जाता है, जब अपने ही पद की गरिमा को कलंकित करता है, तब न सिर्फ बच्चों का विश्वास टूटता है, बल्कि संपूर्ण गुरु-शिष्य परंपरा भी आहत होती है। ऐसा ही एक हृदयविदारक मामला छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले से सामने आया है, जहाँ एक शासकीय स्कूल के प्रधान पाठक को लैंगिक अपराध के मामले में दोषी पाते हुए अदालत ने 20 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इसके पश्चात शिक्षा विभाग ने भी उन्हें तत्काल प्रभाव से पद से बर्खास्त कर दिया है।
 कुंजबिहारी हाठिले, जो शासकीय प्राथमिक शाला जैतपुरी, विकासखंड कवर्धा में प्रधान पाठक के पद पर कार्यरत थे (वर्तमान में निलंबित), पर माननीय विशेष न्यायालय (एफ.टी.एस.सी.) कबीरधाम ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), धारा C 6 के तहत दोषी पाया। न्यायालय ने 30 मार्च 2024 को उन्हें 20 वर्षों के सश्रम कारावास तथा ₹1000 के अर्थदंड (जिसकी अदायगी न होने पर 6 माह की अतिरिक्त सजा) से दंडित किया।
जिला शिक्षा अधिकारी, कबीरधाम ने न्यायालय के निर्णय के आलोक में श्री हाठिले को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 के तहत गंभीर कदाचार का दोषी मानते हुए उन्हें दिनांक 30/03/2024 से पदच्युत (Dismiss) करने का आदेश जारी किया। विभाग ने उनके जीवन निर्वाह भत्ते को अंतिम भुगतान तक सीमित कर दिया है।
गुरु की गरिमा पर धब्बा
भारत में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर स्थान दिया गया है – “गुरु गोविंद दोऊ खड़े…” जैसी परंपराएँ हमारे संस्कृति का आधार हैं। ऐसे में जब कोई शिक्षक अपनी मर्यादा भूलकर छात्र या छात्राओं के साथ विश्वासघात करता है, तो केवल विधिक दंड पर्याप्त नहीं होता – यह समाज के नैतिक ताने-बाने को भी झकझोर देता है।
प्रशासन का सख्त संदेश
यह निर्णय न केवल अपराधी शिक्षक को दंडित करता है, बल्कि ऐसे किसी भी कृत्य के प्रति शिक्षा विभाग की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का प्रमाण भी है। यह संदेश देता है कि यदि कोई भी शिक्षक अपने पद का दुरुपयोग करता है, तो उसे न्याय और प्रशासन दोनों ही स्तरों पर कठोर दंड भुगतना पड़ेगा।

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