छत्तीसगढ़ के कबीरधाम वनमंडल अंतर्गत रेंगाखार परिक्षेत्र का कक्ष क्रमांक 97 — कन्हारी बिट — जैवविविधता और इमरती लकड़ी की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण वन क्षेत्र है। लेकिन आज ये समृद्ध जंगल एक गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। वजह है— इस क्षेत्र में पदस्थ वनरक्षक की अस्वस्थता और विभागीय उपेक्षा।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस बिट का प्रभार जिन वनरक्षक के पास है, वे शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हैं और लाठी के सहारे ही चलने में सक्षम हैं। इनकी हालत ऐसी नहीं है कि वे घने और ऊबड़-खाबड़ जंगलों में नियमित गश्त कर सकें या किसी अवैध कटाई को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकें।
वनरक्षक ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने रेंज अफसर को क्षेत्र में चल रही संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी कई बार दी है, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। नतीजतन, जंगल को मानो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
खास बात यह है कि इस क्षेत्र में सागौन और अन्य इमरती लकड़ियों की भरपूर मात्रा है, जिससे अवैध कटाई की संभावनाएं बनी रहती हैं। ऐसे में जब सुरक्षा के लिए तैनात व्यक्ति खुद असहाय हो और प्रशासन आंख मूंदे हो, तो सवाल उठना लाज़िमी है — क्या वनों की रक्षा अब केवल कागजों पर रह गई है।
वन्यप्रेमियों और स्थानीय ग्रामीणों में भी इस लापरवाही को लेकर चिंता है। वे मांग कर रहे हैं कि या तो वनरक्षक को शारीरिक क्षमता अनुसार वैकल्पिक जिम्मेदारी सौंपी जाए या इस अति संवेदनशील क्षेत्र में सक्षम और सक्रिय कर्मचारियों की तैनाती की जाए।
यह मामला न केवल वनों की सुरक्षा बल्कि विभागीय जवाबदेही पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है। जब पर्यावरण और वन संरक्षण की बात राष्ट्रीय प्राथमिकता हो, तो ऐसे हालात चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
“वनों की सुरक्षा केवल पोस्टरों और अभियानों से नहीं, ज़मीनी सच्चाई से सुनिश्चित होगी” — ऐसा कहना है पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों का ।