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चिल्फी घाटी में शिक्षा संकट: वादे अधूरे, बच्चों का भविष्य अधर में

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स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, बच्चे मजबूर, अभिभावक नाराज़
कवर्धा
कबीरधाम जिले की चिल्फी घाटी… खूबसूरत पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा यह इलाका न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि यहां बैगा और आदिवासी समुदाय की बड़ी आबादी बसती है। लेकिन इन वादियों में शिक्षा की हकीकत बेहद डरावनी है। सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बदहाल है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य अधर में लटका नजर आ रहा है।
“शिक्षक नहीं, तो पढ़ाई कैसे होगी”
चिल्फी घाटी स्थित स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में 225 छात्र पढ़ते हैं। लेकिन स्कूल में सिर्फ 6 नियमित शिक्षक पदस्थ हैं। मानक के अनुसार इस विद्यालय को सुचारू रूप से चलाने के लिए 24 शिक्षकों की आवश्यकता है। गणित और विज्ञान जैसे अहम विषयों के शिक्षक न होने से छात्र-छात्राएं सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
ग्राउंड पर बात करने पर बच्चों ने अपनी नाराजगी साफ जाहिर की। कक्षा 10वीं के छात्र अर्जुन कहते हैं
“एक ही सर हमें गणित भी पढ़ाते हैं और साइंस भी… वो भी अधूरा। पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है। परीक्षा कैसे देंगे, हमें समझ नहीं आ रहा।”
अभिभावकों का आक्रोश
अभिभावकों ने भी रोष जताते हुए कहा कि “सरकार और विभाग सिर्फ वादे कर रहे हैं, लेकिन बच्चों की पढ़ाई चौपट हो रही है।”
ग्रामीणों ने बताया कि सुशासन तिहार के दौरान अधिकारियों ने लिखित आश्वासन दिया था कि नए सत्र से पहले शिक्षक भर्ती कर ली जाएगी। लेकिन नया सत्र शुरू हुए महीनों हो गए, अब तक एक भी नियुक्ति नहीं हुई।

एक शिक्षक, कई कक्षाओं का बोझ
चिल्फी घाटी ही नहीं, आसपास के कई सरकारी स्कूलों में हालात अलग नहीं हैं। कहीं 2–3 शिक्षक ही सैकड़ों बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठा रहे हैं। कई जगहों पर एक-एक शिक्षक को कक्षा 6वीं से 10वीं तक पढ़ाना पड़ रहा है। नतीजा यह है कि न तो बच्चों की बुनियाद मजबूत हो पा रही है, न ही उच्च शिक्षा की तैयारी।
सीमावर्ती इलाका और बैगा समुदाय की चिंता
बोड़ला विकासखंड का यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का अंतिम छोर है। यहां से आगे महज 10 किलोमीटर बाद मध्यप्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है। बैगा जनजाति और आदिवासी परिवारों की घनी आबादी वाले इस इलाके में शिक्षा ही भविष्य बदलने का एकमात्र रास्ता है। लेकिन विभाग की लापरवाही ने पीढ़ी दर पीढ़ी बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का खतरा खड़ा कर दिया है।
सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग
लोगों का कहना है कि अधिकारियों की वादाखिलाफी और उदासीन रवैया अब असहनीय हो गया है। सवाल यह है कि कब तक ग्रामीण और आदिवासी बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित रहेंगे। क्या शिक्षा विभाग तभी जागेगा जब एक पूरी पीढ़ी अंधकार में डूब जाएगी ।

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