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“एक शिक्षक, पाँच कक्षाएँ — सीतापार के बच्चों का हक़ किसने छीना”

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— शिक्षा का अधिकार कानून पर सीधा सवाल, जिम्मेदार विभाग मौन

बलौदाबाजार जिले के पलारी विकासखंड का गांव सीतापार आज उस सच्चाई का प्रतीक बन गया है, जहाँ सरकार के “शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009” और “मुख्यमंत्री शिक्षा गुणवत्ता अभियान” दोनों ही धरातल पर बुरी तरह विफल नज़र आ रहे हैं।
यहाँ के शासकीय प्राथमिक विद्यालय की स्थिति बेहद चिंताजनक है—पाँच कक्षाओं का संचालन महज़ एक शिक्षक के भरोसे हो रहा है। बाकी दो शिक्षकों में से एक बिना किसी सूचना के दो महीने से गायब है, जबकि प्रधान पाठक बीते दो वर्षों से बी.एड. परीक्षा हेतु कार्यमुक्त हैं।

संकुल समन्वयक द्वारा बार-बार रिपोर्ट भेजे जाने के बावजूद विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है। हैरानी की बात यह है कि अनुपस्थित शिक्षक का वेतन भी नियमित रूप से जारी किया जा रहा है — जो कि सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ सेवा आचरण नियम 1965 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के विपरीत है।

ग्रामीणों के अनुसार, अनुपस्थित शिक्षक अक्सर नशे में स्कूल आते थे, जिससे बच्चों की पढ़ाई बाधित होती थी। अब उनके दो महीने की गैरहाजिरी के बाद पूरा स्कूल ठप्प है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की तो वे विद्यालय में तालाबंदी और आंदोलन करेंगे।

इसी बीच, विद्यालय भवन की स्थिति भी खतरे के स्तर पर पहुँच चुकी है — छत टपक रही है, दीवारें फटी हैं, और बच्चे पुराने खपरैल भवन में पढ़ने को मजबूर हैं।

सवाल उठता है — जब RTE कानून प्रत्येक बच्चे को 6 से 14 वर्ष की आयु में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है, तो सीतापार के इन मासूमों को यह अधिकार क्यों नहीं मिल रहा?
क्या अधिकारी “लापरवाह शिक्षक” को संरक्षण दे रहे हैं?
क्या मुख्यमंत्री शिक्षा गुणवत्ता अभियान केवल कागजों तक सीमित है?

अगर व्यवस्था ऐसे ही सोई रही, तो सीतापार जैसे गांव “शिक्षा सुधार” की जगह “शिक्षा पतन” के प्रतीक बन जाएंगे।

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