छत्तीसगढ़ सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन देने के लिए अनेक योजनाएँ लागू कर रही है।
महतारी वंदन योजना के तहत ₹1000 मासिक सहायता, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से मुफ्त रसोई गैस, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान योजना) के माध्यम से स्वरोजगार प्रशिक्षण, और मनरेगा के तहत 150 दिनों तक का रोजगार — ये सब योजनाएँ महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के उद्देश्य से चलाई जा रही हैं। लेकिन ज़मीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है।
बलौदाबाजार जिले के मंदिरों, चौक-चौराहों और बाज़ारों में आज भी कई महिलाएँ भिक्षावृत्ति करने को विवश हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है — क्या योजनाओं का लाभ वास्तव में उन तक पहुँच पा रहा है, जिनके लिए ये योजनाएँ बनी हैं।
कई महिलाओं का कहना है कि उन्हें योजना की जानकारी नहीं मिली, या फिर आवेदन प्रक्रिया इतनी जटिल है कि वे बीच में ही छोड़ देती हैं। कुछ के नाम सूची में दर्ज हैं, लेकिन लाभ कभी हाथ में नहीं आया। विशेषज्ञों के अनुसार, योजनाएँ प्रभावी तभी होंगी जब क्रियान्वयन की मॉनिटरिंग मजबूत की जाए और जिम्मेदारी तय हो।
स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर पर फील्ड सर्वे, जनजागरूकता अभियान और लाभार्थी सत्यापन को प्राथमिकता देना ज़रूरी है।
जिले के कुछ ग्रामों में बिहान स्व-सहायता समूहों ने स्वरोजगार के सफल उदाहरण पेश किए हैं, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में समूह निष्क्रिय पड़े हैं। इसी तरह, महतारी वंदन योजना के लाभ के वितरण में भी देरी और तकनीकी बाधाओं की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि लाभार्थियों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए डोर टू डोर सर्वे और पारदर्शी मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जा रहा है।
सरकार की नीयत सशक्तिकरण की है, पर सफलता तभी मानी जाएगी जब हर पात्र महिला की हथेली में योजना का लाभ पहुँचे, न कि वह उसी हथेली को आगे बढ़ाने पर मजबूर हो।