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राष्ट्रपति के ‘दत्तक पुत्र’ बैगाओं के साथ विश्वासघात , स्वीकृति वर्ष बीता, वर्तमान में भी अधर में 500 आवास

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विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय—जिन्हें देश में “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” के रूप में सम्मानित किया जाता है—उनके उत्थान के लिए केंद्र सरकार द्वारा संचालित प्रधानमंत्री जनमन योजना का उद्देश्य था कि दूरस्थ और वंचित जनजातीय परिवारों को सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराया जाए। स्वयं प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इस योजना को अत्यंत पिछड़ी जनजातियों (PVTG) के जीवन स्तर में सुधार हेतु प्राथमिकता दी है।
लेकिन कबीरधाम जिले के पंडरिया विकासखंड अंतर्गत बैगा बाहुल्य ग्राम पंचायत कांदावानी और उसके आश्रित गांवों की जमीनी तस्वीर इस महत्वाकांक्षी योजना पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
500 आवास स्वीकृत, 80 फीसदी अधर में
सूत्रों और स्थानीय ग्रामीणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार कांदावानी पंचायत क्षेत्र में लगभग 500 आवास स्वीकृत हुए। किंतु वास्तविक स्थिति यह है
लगभग 20 प्रतिशत आवास ही पूर्ण हो पाए हैं।
लगभग 20 प्रतिशत आवासों का निर्माण अब तक प्रारंभ ही नहीं हुआ।
शेष 60 प्रतिशत आवास प्रगतिरत बताए जा रहे हैं, लेकिन अधिकांश निर्माण कार्य भगवान भरोसे अधर में लटका हुआ है।कई स्थानों पर केवल नींव डाली गई है, कहीं दीवारें अधूरी हैं, तो कहीं छत का कार्य प्रारंभ ही नहीं हुआ।
स्वीकृति वर्ष बनाम वर्तमान वर्ष: देरी पर बड़ा सवाल
प्राप्त जानकारी के अनुसार अधिकांश आवासों की स्वीकृति वर्ष 2023-24 में दी गई थी, जिनका निर्माण निर्धारित समयावधि में पूर्ण होना अपेक्षित था। किंतु अब वर्तमान वर्ष 2026 में भी अधिकांश आवास अधूरे पड़े हैं।
योजना की समयसीमा को देखते हुए यह देरी केवल तकनीकी बाधा नहीं मानी जा सकती। निर्माण वर्ष बीतने के बाद भी 80 प्रतिशत आवासों का अधर में होना कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यदि स्वीकृति के दो वर्ष बाद भी लाभार्थी छत के नीचे नहीं रह पा रहे, तो यह योजना के क्रियान्वयन की विफलता का स्पष्ट संकेत है।

योजना का उद्देश्य बनाम जमीनी सच्चाई
प्रधानमंत्री जनमन योजना का मूल उद्देश्य था—विशेष पिछड़ी जनजातियों को सुरक्षित आवास, मूलभूत सुविधाएं और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना। बैगा समुदाय, जो आज भी वनांचल और दुर्गम क्षेत्रों में जीवन यापन करता है, इस योजना से सबसे अधिक उम्मीद लगाए बैठा था।
लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कागजों में प्रगति और धरातल पर अधूरे ढांचे के बीच भारी अंतर दिखाई दे रहा है।
दलालों की सक्रियता और राशि आहरण का खेल
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कुछ तथाकथित दलालों ने बैगा हितग्राहियों को विश्वास में लेकर उनके खातों से आवास निर्माण की राशि आहरित कर ली। चूंकि यह योजना हितग्राही-आधारित है और राशि सीधे लाभार्थी के खाते में आती है, इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर और अशिक्षित परिवारों को भ्रमित कर रकम निकलवा ली गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ लोग राशि लेकर फरार हो गए, जबकि कुछ अब भी गबन की फिराक में हैं। कई हितग्राहियों के खाते से राशि निकल चुकी है, पर निर्माण कार्य ठप पड़ा है।
यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता बल्कि संवेदनशील जनजातीय समुदाय के साथ सीधा छल होगा।
प्रशासनिक चौपाल भी बेअसर
पिछले माह जिला कलेक्टर और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर निर्माण कार्य शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिए थे। चौपाल लगाकर स्थिति की समीक्षा भी की गई थी।
लेकिन उसके बाद भी अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा। यदि शीर्ष स्तर के निर्देशों के बावजूद जमीनी हालात नहीं बदलते, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

 

जवाबदेही  की मांग
यह मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं है। यह उस समुदाय से जुड़ा है, जिसे विशेष संरक्षण और संवेदनशीलता के साथ देखा जाता है।
स्वीकृति वर्ष 2023- 24 और  वर्तमान वर्ष 2026- 27 में भी आवास अधूरे रहने की स्थिति यह संकेत देती है कि योजना की मॉनिटरिंग और क्रियान्वयन में गंभीर खामियां हैं।
अब आवश्यकता है
स्वीकृति वर्ष से अब तक की समयरेखा की जांच
खातों से आहरित राशि का वित्तीय ऑडिट
अधूरे आवासों का भौतिक सत्यापन
दोषियों पर दंडात्मक कार्रवाई
अन्यथा राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बैगा समुदाय के नाम पर चल रही योजना भी केवल कागजी उपलब्धि बनकर रह जाएगी।
क्या समयसीमा के उल्लंघन और कथित अनियमितताओं पर ठोस कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा।

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