नगर पंचायत पांडातराई के वार्ड क्रमांक 5 स्थित झुट्टा तालाब सौंदर्यीकरण कार्य में गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। लगभग 47 लाख रुपये की लागत से चल रहे इस कार्य में गुणवत्ता मानकों को ताक पर रखकर निर्माण किए जाने के आरोप लगे हैं। मौके की तस्वीरें यह दर्शाती हैं कि पुरानी पिचिंग के ऊपर जमी मिट्टी और मलबे को हटाए बिना सीधे सरिया बिछाकर ढलाई की तैयारी कर दी गई है। यह न केवल तकनीकी लापरवाही है, बल्कि शासन के स्पष्ट गुणवत्ता निर्देशों की खुली अवहेलना भी है।
जिला कलेक्टर द्वारा हाल ही में सभी निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता न करने के सख्त निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद झुट्टा तालाब में हो रहा निर्माण कार्य “राम भरोसे” संचालित होता दिखाई दे रहा है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के निर्माण संबंधी दिशा-निर्देशों तथा CPWD व PWD वर्क मैनुअल के अनुसार किसी भी आरसीसी ढलाई से पूर्व बेस सतह की पूर्ण सफाई, ढीली मिट्टी और मलबे की निकासी तथा समतलीकरण अनिवार्य होता है। ऐसा न करने पर कंक्रीट की पकड़ कमजोर पड़ती है और भविष्य में दरारें, धंसाव या संरचनात्मक क्षति की आशंका बढ़ जाती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि निर्माण स्थल पर न तो नियमित इंजीनियर की मौजूदगी दिखाई देती है और न ही तकनीकी पर्यवेक्षण का कोई स्पष्ट इंतजाम है। नगर पंचायत में स्थायी इंजीनियर की कमी पहले से बनी हुई है। ऐसे में बाहरी इंजीनियर के भरोसे करोड़ों के कार्य कराना स्वयं में गंभीर प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है। बिना तकनीकी निगरानी के कार्य होना सीधे-सीधे छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम और सार्वजनिक निर्माण प्रक्रियाओं के विपरीत माना जा रहा है।
यदि ढलाई से पहले बेस की उचित तैयारी नहीं की गई तो संरचना अल्पकालिक साबित हो सकती है। इससे न केवल सरकारी धन की बर्बादी होगी बल्कि भविष्य में मरम्मत के नाम पर फिर से लाखों रुपये खर्च करने की नौबत आ सकती है। यह मामला वित्तीय अनुशासन और लोक धन के दुरुपयोग की श्रेणी में भी आ सकता है।
जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। जब मौके पर तकनीकी खामियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं, तब निगरानी तंत्र निष्क्रिय क्यों है? क्या यह महज लापरवाही है या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं।
नगरवासियों ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष तकनीकी जांच, गुणवत्ता परीक्षण (क्यूब टेस्ट/मैटेरियल टेस्ट) तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि 47 लाख रुपये की परियोजना में ही नियमों की ऐसी अनदेखी होगी, तो विकास कार्यों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।