छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम के मूल उद्देश्य—वन संरक्षण, वनीकरण, सतत लकड़ी उत्पादन, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार—पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। निगम अंतर्गत बारनवापारा परियोजना मंडल के रवान परिक्षेत्र में अवैध कटाई और कथित भ्रष्टाचार चरम पर होने का आरोप ग्रामीण सूत्रों द्वारा लगाया जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार, बीते दो–तीन वर्षों में अलग-अलग वन कक्षों में प्लांटेशन के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो पौधों का समुचित विकास दिखा और न ही निगम को अपेक्षित उत्पादन लाभ मिला। आरोप है कि इस अवधि में पर्यावरणीय लक्ष्य और योजना का उद्देश्य पीछे छूट गया, जबकि कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों का आर्थिक विकास जरूर हुआ।
सूत्रों का दावा है कि रवान परिक्षेत्र में अवैध रूप से बहुमूल्य सागौन की कटाई कराए जाने की बातें सामने आ रही हैं। यह भी आरोप है कि कूप कटाई के लिए चिन्हित (मार्किंग) पेड़ों को न काटकर मनपसंद इमारती लकड़ियों की कटाई कर निर्धारित घन मीटर की पूर्ति दिखाई गई, जो वन अधिनियमों और निगमीय मानकों के विपरीत है। यदि चिन्हित वृक्ष नहीं काटे गए, तो लक्ष्य पूर्ति कैसे हुई—यह प्रश्न जांच की मांग करता है।
ग्रामीण सूत्रों ने कोडार काष्ठागार से जुड़े एक पुराने प्रकरण का भी उल्लेख किया है, जिसमें लाट संख्या 887 को कथित रूप से डबल लाट बनाकर नीलाम किए जाने की चर्चा है। आरोप है कि ऐसी पूर्ति के लिए अवैध कटाई की लकड़ी का उपयोग किया गया होगा। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच आवश्यक बताई जा रही है।
इसके अलावा, बड़गांव वन कक्ष 97 (नीलगिरी प्लांटेशन) और वन कक्ष 98 (सागौन प्लांटेशन) में भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं, जहां वर्षों बाद भी निगम को एक भी लट्ठा उत्पादन के रूप में लाभ नहीं मिल पाया—जबकि योजना का उद्देश्य ही दीर्घकालिक उत्पादन और राजस्व सृजन है। वित्तीय मोर्चे पर भी फर्जी मास्टर रोल, मजदूरों के नाम पर बैंक खाते/एटीएम बनवाकर राशि आहरण और चॉइस सेंटर के माध्यम से धन की हेराफेरी जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि ये आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग और श्रम कानूनों का भी गंभीर उल्लंघन होगा।
ग्रामीणों का कहना है कि जल्द ही इन मामलों की निगम मुख्यालय स्तर पर औपचारिक शिकायत की जाएगी, जिससे योजना के उद्देश्य से भटके कार्यों की परतें खुलें और दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई हो। जानकारों के मुताबिक, यदि फाइलें खुलीं तो वन संरक्षण के नाम पर हुई कथित अनियमितताओं के बड़े राज सामने आ सकते हैं।
फिलहाल, ये सभी आरोप ग्रामीण सूत्रों पर आधारित हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निगम और संबंधित विभाग निष्पक्ष जांच कर योजना के वास्तविक उद्देश्यों—वन संरक्षण, पारदर्शिता और जनहित—की पुनर्स्थापना कब सुनिश्चित करते हैं।