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बिना नाले के पुलिया! जनमन की सड़क में गुणवत्ता से समझौता, आदिवासी इलाके में विकास या दिखावा

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 कवर्धा : प्रधानमंत्री जनजाति न्याय महाभियान और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत कबीरधाम जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र में बन रही सड़क पर सवालों की बौछार शुरू हो गई है। केवल 1.150 किलोमीटर की इस सड़क में नाले की अनुपस्थिति के बावजूद दो पुलिया बना दी गई हैं, जिससे न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका है, बल्कि स्थानीय किसानों की आजीविका भी खतरे में पड़ सकती है।
जनजातीय गांवों के लिए ‘विकास’, लेकिन बिना योजना के?
कोहापाली से पलानीपाट तक बनाई जा रही यह सड़क कौहापानी के विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) समुदाय को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए बनाई जा रही है। अनुमानित लागत ₹59.24 लाख है और इसका निर्माण कार्य मेसर्स अमित कंस्ट्रक्शन, कवर्धा को सौंपा गया है। कार्य की देखरेख प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, परियोजना क्रियान्वयन इकाई कबीरधाम द्वारा की जानी है।
 लेकिन सवाल उठता है – क्या वास्तव में यह सड़क जनजातीय समाज की सुविधा के लिए है, या फिर यह महज़ एक “पेपर प्रोजेक्ट” बनकर रह जाएगी? स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण में घटिया स्तर की मुरूम डाली गई है, जिससे शुरुआत से ही सड़क की गुणवत्ता संदिग्ध नजर आ रही है।
जब नाला ही नहीं, तो पुलिया क्यों?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस मार्ग पर एक भी प्राकृतिक नाला नहीं है, वहां दो बड़े पाइप पुलिया बना दी गई हैं। प्रशासनिक तर्क यह दिया गया है कि पहाड़ी से आने वाले पानी से सड़क को बचाने के लिए यह निर्माण आवश्यक था। लेकिन यह पानी अब नीचे खेतों में जाएगा, जिससे किसानों की फसलों को नुकसान हो सकता है। सवाल यह है कि अगर यह पानी फसलों को तबाह करेगा तो उसकी भरपाई कौन करेगा?

 

 

सूचना पटल बना मज़ाक, पारदर्शिता नदारद
निर्माणस्थल पर लगाए गए नागरिक सूचना पटल में न तो पूरी जानकारी है, न ही पारदर्शिता। इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितने पुल, पुलिया, डामरीकरण या सीसी रोड का निर्माण होगा। जब जनता के सामने जानकारी छिपाई जाती है, तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश और बढ़ जाती है।
आखिर जवाबदेह कौन?
क्या यह एक और “फाइलों में बनी सड़क” बनकर रह जाएगी? क्या आदिवासियों के नाम पर आवंटित करोड़ों का पैसा यूं ही बहता रहेगा? यह मामला सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत का आईना है।
अब ज़रूरत है स्वतंत्र जांच और जवाबदेही तय करने की। ताकि ‘विकास’ की परिभाषा ठेकेदारों के मुनाफे से नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीकत से तय हो।

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