कवर्धा, , कबीरधाम जिले के सहसपुर लोहारा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सिंगारपुर के आश्रित ग्राम कौहापानी के बच्चों का भविष्य आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अंधकारमय है। जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ी किनारे बसे इस गांव में विशेष पिछड़ी जनजाति समुदाय के परिवार रहते हैं, परंतु यहां ना तो कोई स्कूल संचालित है और ना ही आंगनवाड़ी केंद्र।
स्कूल और आंगनवाड़ी का अभाव
गांव में कुल 11 परिवार निवास करते हैं, जिनमें से 10 परिवार विशेष पिछड़ी जनजाति और एक यादव परिवार है। गांव में पंचायत का एक वार्ड भी शामिल है और पंच भी यहीं से चुना गया है, बावजूद इसके बच्चों के लिए न तो प्रारंभिक शिक्षा की कोई व्यवस्था है और ना ही 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए पोषण एवं देखभाल की सुविधा उपलब्ध है। कुछ बच्चे छात्रावास और आश्रमों में जाकर पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन शेष बच्चे शिक्षा से वंचित हैं।
संवैधानिक अधिकारों से वंचित
भारत के संविधान में बच्चों को शिक्षा और पोषण का अधिकार प्राप्त है। केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के अंतर्गत आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों और महिलाओं के सर्वांगीण विकास हेतु विभिन्न सुविधाएं दी जाती हैं। परंतु कौहापानी में यह योजनाएं महज कागजों तक सिमटी हुई हैं। 0 से 3 वर्ष और 3 से 6 वर्ष के बच्चों को जो पोषण, टीकाकरण और पूर्व-शैक्षणिक गतिविधियां मिलनी चाहिए, उससे वे वंचित हैं।
विकास से कोसों दूर
कौहापानी में केवल एक छोटा सामुदायिक भवन और सीमित सीसी रोड का निर्माण हुआ है। गांव के लोग अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित तो हैं, लेकिन अशिक्षा और जागरूकता की कमी के चलते अपनी मांगों को सही मंच तक पहुंचाने में असमर्थ हैं। हालांकि अब गांव के पंच पंचायत के माध्यम से प्रस्ताव रखकर स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र की मांग करने की दिशा में विचार कर रहे हैं।
जब देशभर में डिजिटल इंडिया और शिक्षित भारत की बात हो रही है, तब एक विशेष पिछड़ी जनजाति बहुल गांव में शिक्षा की मूलभूत सुविधा तक न होना चिंता का विषय है। सरकार और प्रशासन को जल्द से जल्द इस दिशा में ध्यान देना चाहिए, ताकि कौहापानी जैसे गांवों के बच्चे भी देश के भविष्य निर्माण में समान भागीदारी निभा सकें।