कबीरधाम के ग्रामीण क्षेत्रों में लाइसेंसविहीन बीजों की बिक्री, परामर्श केंद्र बंद, कृषि विभाग कार्यक्रमों में व्यस्त
कबीरधाम जिला का मध्यप्रदेश की सीमा से सटा अंतिम छोर, खासकर पंडरिया, बोडला विकासखंड तथा चिल्फी, रेंगाखार और झलमला जैसे वनांचल गांव इन दिनों नकली धान बीजों के खतरे से जूझ रहे हैं। इन क्षेत्रों में बैगा जनजाति की आबादी मुख्य रूप से निवास करती है और उनका व्यापारिक लेनदेन छत्तीसगढ़ की बजाय मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिलों से अधिक होता है।
हाल ही में मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में एक राइस मिल से नकली धान बीजों का बड़ा जखीरा पकड़ा गया, जिसे अवैध रूप से पैक कर ग्रामीण बाजारों में भेजा जा रहा था। यह आशंका जताई जा रही है कि ऐसे बीजों की आपूर्ति कबीरधाम के सीमावर्ती गांवों तक भी हो रही है।
इन गांवों में चलने वाले साप्ताहिक हाट बाजारों में मध्यप्रदेश के व्यापारियों का लगातार आना-जाना लगा रहता है, जिससे नकली बीजों की खपत की संभावना और भी बढ़ जाती है।
प्रशासनिक उदासीनता और विभागीय लापरवाही
गंभीर बात यह है कि यह सारा लेन-देन उस समय हो रहा है जब कृषि विभाग ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ में व्यस्त है। दूसरी ओर गांवों में स्थापित कृषक परामर्श केंद्र बंद पड़े हैं या उनमें ताले लटक रहे हैं। इससे किसानों को कोई मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है।
मिली जानकारी के अनुसार, वनांचल क्षेत्र के एक विक्रेता की दुकान में गड़बड़ी पाए जाने पर उसका लाइसेंस निलंबित किया गया था, लेकिन प्रभावशाली दबाव में उसे फिर से बहाल कर दिया गया, जो अब चर्चा का विषय बना हुआ है।
कानूनी प्रावधान और लापरवाही
बीज अधिनियम, 1966 (Seeds Act, 1966) के तहत किसी भी बीज की बिक्री हेतु प्रमाणित लाइसेंस एवं प्रिंसिपल सर्टिफिकेट आवश्यक है।
अधिनियम की धारा 7 और 8 के अनुसार, बीजों की गुणवत्ता, अंकुरण क्षमता और वैधता का निरीक्षण आवश्यक है।
इसके अलावा भ्रामक लेबलिंग, बिना सैंपलिंग, और लाइसेंसविहीन विक्रय को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
कबीरधाम में हाइब्रिड, ओ.पी. और रिसर्च बीजों की बिक्री तो हो रही है, लेकिन विभाग द्वारा इनका कोई सैंपलिंग या परीक्षण नहीं किया जा रहा, जिससे किसानों के साथ ठगी की आशंका और भी गहरा गई है।
जब तक कृषि विभाग जमीनी हकीकत को समझते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय निगरानी नहीं करेगा, तब तक नकली बीज माफिया का जाल और भी फैलता जाएगा। यह ना केवल किसानों की आर्थिक क्षति है बल्कि पूरे कृषि तंत्र की विफलता को दर्शाता है।