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272 जोड़ों का सामूहिक विवाह, पर वनांचल में बाल विवाह की अनदेखी! कबीरधाम प्रशासन की दोहरी तस्वीर उजागर

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 कबीरधाम जिला मुख्यालय में कल मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अंतर्गत 272 जोड़ों का सामूहिक विवाह पूरे प्रशासनिक तामझाम और महीनों की तैयारी के साथ संपन्न हुआ। जिला प्रशासन का पूरा अमला पिछले एक महीने से आयोजन की तैयारी में जुटा रहा। मंच सजा, प्रचार हुआ, जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी रही और योजना को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया।

लेकिन इसी जिले के वनांचल क्षेत्रों—तरेगांव, चिल्फी और कुकदूर परियोजना क्षेत्र के जंगल-पहाड़ वाले गांवों—में बाल विवाह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब जिला मुख्यालय में कानून और योजनाओं का प्रदर्शन हो रहा है, तब दूरस्थ क्षेत्रों में कानून की धज्जियां क्यों उड़ रही हैं?

क्या कहता हैं कानून 

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत:

लड़की की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष निर्धारित है।

बाल विवाह कराना, उसमें सहयोग करना या मौन समर्थन देना दंडनीय अपराध है।

दोषी पाए जाने पर दो वर्ष तक की सजा और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।

इसके अलावा:

पोक्सो अधिनियम, 2012 के तहत नाबालिग के साथ वैवाहिक संबंध भी दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और आईपीसी की धारा 366ए भी नाबालिग लड़कियों के संरक्षण की बात करती हैं।

जिम्मेदार कौन

गांवों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका, सरपंच और पंच की मौजूदगी के बावजूद बाल विवाह की घटनाएं होना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ), महिला एवं बाल विकास विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होती है।

यदि गांव स्तर पर नाबालिग की शादी हो रही है, तो:

क्या ग्राम पंचायत को जानकारी नहीं होती?

क्या आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की निगरानी तंत्र केवल कागजों तक सीमित है?

क्या वनांचल क्षेत्रों में कानून लागू करने की इच्छाशक्ति कमजोर है?

दोहरी व्यवस्था पर सवाल

एक ओर सरकार सामाजिक सुरक्षा और कन्यादान जैसी योजनाओं के माध्यम से सामूहिक विवाह करवा रही है, दूसरी ओर उसी जिले के दूरस्थ इलाकों में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति जारी है। यदि नाबालिगों के विवाह की घटनाएं सच हैं, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि प्रशासनिक तंत्र की विफलता भी है।

राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या योजनाओं का उद्देश्य केवल आयोजन और आंकड़ों तक सीमित है, या वास्तव में सामाजिक सुधार भी प्राथमिकता में है?

आवश्यक कार्रवाई

वनांचल क्षेत्रों में विशेष जांच दल गठित किया जाए।

प्रत्येक ग्राम पंचायत में आयु सत्यापन की अनिवार्य प्रक्रिया लागू की जाए।

दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर दंडात्मक कार्रवाई हो।

बाल विवाह रोकथाम हेतु स्कूल, आंगनवाड़ी और पंचायत स्तर पर सख्त निगरानी तंत्र सक्रिय किया जाए।

कबीरधाम में 272 जोड़ों का विवाह प्रशासन की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन यदि उसी जिले में बाल विवाह जारी है, तो यह उपलब्धि सवालों के घेरे में खड़ी नजर आती है। विकास और कानून का राज केवल मंचों तक सीमित नहीं होना चाहिए—जंगल-पहाड़ के गांवों तक उसका असर दिखना जरूरी है।

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