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नगर पालिका के सामने ही नियमों की धज्जियां! निर्माण के बाद की जा रही सीसी रोड की कटिंग, गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल

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नगर पालिका परिषद बलौदा बाजार के ठीक सामने किए गए पथ-वे एवं सीसी रोड निर्माण में भारी तकनीकी अनियमितताओं का मामला सामने आया है। जिस कार्य को तकनीकी मानकों के अनुरूप निर्माण के दौरान ही पूरा किया जाना चाहिए था, उसकी कटिंग अब निर्माण के बाद मशीन से की जा रही है। यह स्थिति न केवल निर्माण की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है, बल्कि जिम्मेदारों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाती है।

जानकारी के अनुसार नगर पालिका परिषद के सामने सड़क के दोनों किनारों पर सीसी रोड (Cement Concrete Road) का निर्माण किया गया है। तकनीकी मानकों के तहत सीसी रोड निर्माण में पहले सबग्रेड की समुचित तैयारी, उचित कॉम्पेक्शन, निर्धारित ग्रेड की कंक्रीट (जैसे M-20 या M-25), सही मोटाई (आमतौर पर 150 मिमी से 200 मिमी) तथा एक्सपेंशन और कंस्ट्रक्शन जॉइंट का प्रावधान किया जाता है। इसके अलावा साइड ड्रेनेज और शोल्डर लेवलिंग भी निर्माण प्रक्रिया के दौरान ही सुनिश्चित की जाती है।

लेकिन यहां स्थिति उलट दिखाई दे रही है। निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद अब मशीन से सीसी रोड की कटिंग की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि कंक्रीट सेट होने के बाद अनियोजित कटिंग की जाती है तो उससे माइक्रो-क्रैक (सूक्ष्म दरारें) विकसित हो सकती हैं, जिससे सड़क की दीर्घकालिक मजबूती प्रभावित होती है। कटिंग के दौरान कंपन और दबाव से कंक्रीट की बॉन्डिंग क्षमता कमजोर होती है, जिससे भविष्य में गड्ढे, क्रैकिंग और पपड़ी उखड़ने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह कार्य नगर पालिका परिषद के सामने ही हो रहा है, जहां अधिकारी प्रतिदिन आते-जाते हैं। इसके बावजूद यदि निर्माण के बाद सुधारात्मक कटिंग की नौबत आई है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि प्रारंभिक सर्वेक्षण, लेवलिंग और ड्राइंग-डिजाइन में गंभीर चूक हुई है। सार्वजनिक निर्माण के नियमों के अनुसार किसी भी सीसी रोड निर्माण से पूर्व साइट लेवल, क्रॉस-सेक्शन और ढाल (स्लोप) का निर्धारण किया जाना अनिवार्य होता है ताकि वर्षा जल का निकास सुचारू रूप से हो सके। यदि ढाल या लेवल में त्रुटि रह गई हो, तो बाद में कटिंग कर उसे सुधारना गुणवत्ता से समझौता ही माना जाएगा।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि निर्माण कार्य में जल्दबाजी और निरीक्षण की कमी साफ नजर आ रही है। सवाल यह भी उठता है कि क्या कार्य के दौरान तकनीकी सहायक, उप अभियंता या प्रभारी अभियंता द्वारा नियमित मॉनिटरिंग की गई थी? क्या गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण—जैसे क्यूब टेस्ट, स्लंप टेस्ट—किए गए थे? यदि किए गए, तो उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

नगर पालिका परिषद जैसी संस्था के सामने यदि इस प्रकार की लापरवाही उजागर हो रही है, तो शहर के अन्य वार्डों में चल रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी संदेह स्वाभाविक है। निर्माण के बाद कटिंग कर सुधार करने की प्रवृत्ति सरकारी धन के दुरुपयोग और तकनीकी अक्षमता की ओर इशारा करती है।

अब आवश्यकता है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए, संबंधित इंजीनियर और ठेकेदार की जवाबदेही तय की जाए तथा भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अन्यथा विकास के नाम पर जनता के पैसों से बनी सड़कें समय से पहले ही दम तोड़ती रहेंगी और जिम्मेदार सिर्फ मूकदर्शक बने रहेंगे।

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